वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
न प्राणिनां ते स्पृहय़न्ति राज; ञ्शिवश्च कालः स वभूव तेषाम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
न प्राप्तं पैतृकं द्रव्यं धार्तराष्ट्रेण संवृतम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
न प्राप्तपूर्वं यद्भीष्मात्कृपाद्द्रोणाच्च संय़ुगे |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
न प्राप्नुय़ाच्च व्यसनं करकान्यः प्रय़च्छति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
न प्राप्नोति फलं तस्य एवं धर्मविदो विदुः ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रार्थितमभून्मूढ यदिदं प्रार्थितं त्वय़ा ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
न प्राव्यथदमेय़ात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न प्राश्नीतोदकमपि पुनः सा वरवर्णिनी ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
न प्राहरद्यदा भीष्मो घृणित्वाद्द्रुपदात्मजे ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
न प्रिय़ं तदुभय़ं न चाप्रिय़ं; तस्य तज्जनय़तीह कुर्वतः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रिय़ं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रिय़ो मम कृष्णाय़ वीभत्सुर्न युधिष्ठिरः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
न प्रीणाति पितॄन्देवान्स्वर्गं च न स गच्छति ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
न प्रीणय़ति भूतानि निर्व्यञ्जनमिवाशनम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
न प्रीय़ते परानर्थैस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रीय़से महाराज पूज्यमानो द्विजातिभिः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
न प्रीय़से वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यसि |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रेष्या वचनं कुर्युर्न वालो जातु कर्हिचित् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न प्रोष्ठपदय़ोः कार्यं तथाग्नेय़े च भारत ||
११९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
न प्रय़च्छति ते भार्यां यत्ते कार्यं कुरुष्व तत् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
न प्रय़च्छति यः कन्यां तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
न प्रय़च्छन्ति मोहात्ते के भवन्ति महामते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
न प्रय़ोज्यं भवेदेतन्मानुषेषु कथञ्चन ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
न फलं प्राप्नुवन्त्यत्र परलोके तथा ह्यहम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
न फलादर्शनाद्धर्मः शङ्कितव्यो न देवताः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न भक्षोऽभ्यधिकः कश्चिन्मांसादस्ति परन्तप ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
न भक्षय़ति मांसानि परैरुपहृतान्यपि ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
न भक्षय़ति यो मांसं न हन्यान्न च घातय़ेत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
न भक्षय़न्त्यतो मांसं तपोय़ुक्ता मनीषिणः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न भक्षय़ामि मांसानि ऋतुगामी तथा ह्यहम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
न भक्षय़ेद्वृथामांसं पृष्ठमांसं च वर्जय़ेत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न भग्ने नावदीर्णे वा शय़ने प्रस्वपेत च |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
न भद्रे परदारेषु मनो मे सम्प्रसज्जति |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
न भरेथाः कथं नु त्वं धर्मज्ञः सन्स्वमात्मजम् ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
शकुनिरु उवाच
न भर्तुः शासनं वीरा रणे कुर्वन्त्यमर्षिताः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न भवति विदुषां ततो भय़ं; यदविदुषां सुमहद्भय़ं भवेत् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
न भवति विदुषां महद्भय़ं; यदविदुषां सुमहद्भय़ं भवेत् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
न भवान्क्षत्रधर्मेषु कुशलोऽसीति मे मतिः |
३८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
न भवान्न च ते भृत्या न कर्णो न च सौवलः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
न भवान्समरे शक्यः सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ||
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
न भविष्यति दुर्वुद्धिर्धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ||
९४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
न भविष्यति वोऽपत्यमिति सर्वजगत्पते ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
न भविष्यन्ति कौन्तेय़ यत्ते कृत्यं तदाचर ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
न भवेत्कुरुपाण्डूनां सौभ्रात्रेण महान्क्षय़ः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
न भवेद्धि तथा दुःखं यथा गङ्गाविय़ोगजम् ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
न भवेम यथा राजंस्तथा शीघ्रं विधीय़ताम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
न भवेय़मन्ध इति ||
१२९ घ
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
न भस्मीक्रिय़ते राजा तावद्युद्धान्निवार्यताम् ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
न भाति कालेऽभिहितं तेनासि हरिणः कृशः ||
२२ ख