द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
तिलशस्तस्य तद्यानं सूतं सर्वाय़ुधानि च |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तिलशो व्यधमत्पार्थः सौवलस्य शितैः शरैः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
तिलहोमपरा विप्राः सर्वे संय़तमैथुनाः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
तिला भक्षय़ितव्याश्च सदा त्वालभनं च तैः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
तिला मांसं मूलफलानि शाकं; रक्तं वासः सर्वगन्धा गुडश्च ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
तिलाः परमकं दानं पुण्यं चैवेह शाश्वतम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
तिलाञ्श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतद्ध्यनुत्तमम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
तिलादाने च क्रव्यादा ये च क्रोधवशा गणाः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
युधिष्ठिर उवाच
तिलानां कीदृशं दानमथ दीपस्य चैव ह |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
तिलान्गन्धान्रसांश्चैव न विक्रीणीत वै क्वचित् |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
तिलान्गुडसुसम्पन्नान्भूतानामुपहारय़ेत् ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
तिलान्ददत पानीय़ं दीपान्ददत जाग्रत |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
तिलालाभे च यो दद्याज्जलधेनुं यतव्रतः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
तिलाश्च सम्प्रदातव्या यथाशक्ति द्विजर्षभ |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
तिले तैलं गवि क्षीरं काष्ठे पावकमन्ततः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
तिलैरग्नित्रय़ं हुत्वा प्राप्तवान्गतिमुत्तमाम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
तिलैर्व्रीहिय़वैर्माषैरद्भिर्मूलफलैस्तथा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
तिलोत्तमा नाम पुरा व्रह्मणा योषिदुत्तमा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
तिलोत्तमार्थे सङ्क्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
तिलोत्तमाय़ां तु तदा गताय़ां लोकभावनः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
तिलोत्तमाय़ास्तौ हेतोरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
तिलोत्तमेत्यतस्तस्या नाम चक्रे पितामहः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठ तात पितुः शास्त्रे मातुश्च भरतर्षभ ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
तिष्ठ तात सतां वाक्ये सुहृदामर्थवादिनाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठ तावद्यावदिदानीमिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादय़ामीति ||
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठाद्य व्रह्मघ्न न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति चामन्त्र्य दुष्कर्णं भ्रातुरग्रतः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति तं भीमः सहसाभ्यद्रवद्वली |
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति न च ते स्वय़ं तत्रावतस्थिरे ||
८५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति नकुलो वभाषे तनय़ं तव |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति राजानं व्रुवन्पाण्डवमभ्ययात् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति राजानं व्रुवन्पाण्डवमभ्ययात् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति वागासीद्द्रावितानां महात्मनाम् |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति सङ्क्रुद्धो हार्दिक्यं प्रत्यभाषत ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति सततं सूतपुत्रस्य जल्पतः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ दुर्योधनाद्य त्वं न कार्यः सम्भ्रमस्त्वय़ा |
७९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति वाणं सन्धाय़ कार्मुके ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तिष्ठ वत्स यथाकामं नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि |
१९५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ स्थितोऽस्मि विद्ध्येनं निवर्तस्व स्थिरो भव |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
तिष्ठता वाय़ुभक्षेण विश्वामित्रेण धीमता ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठतां युध्यमानानां पुनरावर्ततामपि |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
तिष्ठती पुरुषे वुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
तिष्ठते चेद्वशे वुद्धिर्लभते शोकनाशनम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
युधिष्ठिर उवाच
तिष्ठते मे सदा तात कौतूहलमिदं हृदि |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
तिष्ठते हि सुहृद्यत्र न वन्धुस्तत्र तिष्ठति ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठतो युगपालीषु शोणानप्यधितिष्ठतः |
१४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
तिष्ठत्यभीतवत्सङ्ख्ये विभ्रत्कवचधारणाम् ||
१६ ख