विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
अर्जुनः फल्गुनो जिष्णुः किरीटी श्वेतवाहनः |
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
उत्तर उवाच
अर्जुनः फल्गुनो जिष्णुः कृष्णो वीभत्सुरेव च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः शमय़ामासा दिधक्षन्तमिव प्रजाः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः शरवर्षं तद्व्रह्मास्त्रेणैव मारिष |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः सत्यकर्मा च कुरुराजो युधिष्ठिरः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः समरश्लाघी भीष्मस्यावारय़द्दिशः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अर्जुनः समरे शूरः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनप्रमुखाः पार्थाः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनप्रमुखाश्चापि तथेत्येवाव्रुवन्मुदा ||
१६ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनप्रमुखैर्गुप्तां लोकपालोपमैर्नरैः ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनश्च महातेजा रथेनादित्यवर्चसा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनश्च यथा सङ्ख्ये भीमसेनश्च पाण्डवः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
अर्जुनश्च यमौ चैव त्वं च भीमापराजितः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनश्च यमौ चोभौ सर्वे ते प्राहसंस्तदा ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनश्चापि तं देवं भूय़ो भूय़ोऽभ्यवन्दत |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुनश्चापि यच्चक्रे सिन्धुराजवधं प्रति |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनश्चापि राधेय़ं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनश्चापि सङ्क्रुद्धः क्षत्रिय़ान्क्षत्रिय़र्षभ |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुनस्तत्तथाकार्षीत्किं पुनः सर्व एव ते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तन्महद्वाक्यमव्रवील्लोमहर्षणम् ||
३० ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्तस्य चान्वेव यमौ चैव यथाक्रमम् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्तानसम्प्राप्तान्गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु कटाक्षेण जिह्मं प्रेक्ष्य च पार्षतम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु ततः क्रुद्धस्तव सैन्यं विशां पते |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परन्तपः ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु ततो दिव्यमस्त्रं चक्रे हसन्निव |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारुह्य वीर्यवान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु द्रुतं गत्वा शकुनेर्धनुराच्छिनत् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु नरव्याघ्र सुशर्मप्रमुखान्नृपान् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु नरव्याघ्रो दृष्ट्वा भीष्मं महारथम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्तु परं यत्नमातस्थे गुरुपूजने |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु महाराज कृत्वा सैन्यं पृथग्विधम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अर्जुनस्तु महाराज वली नित्यं शमात्मकः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु महाराज व्राह्ममस्त्रमुदैरय़त् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्तु महाराज शरैः शरविघातिभिः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु महाराज शिखण्डिनमभाषत |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु रणे नागमाय़ान्तं रजतोपमम् |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु रणे नादं विनद्य रथिनां वरः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु रणे राजन्दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु रणे शल्यं यतमानं महारथम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु सुशर्माणं विद्ध्वा वहुभिराय़सैः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्त्वरितो जघ्ने पञ्चभिः साय़कोत्तमैः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्त्वेव वार्ष्णेय़ पीडितो वहुभिर्युधि |
८८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य इमे वाणा नेमे वाणाः शिखण्डिनः ||
६० ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दय़ितः पुरा |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य कुरूणां च द्रष्टुं युद्धमुपागताः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य च कर्णेन यतो दृष्टो वभूव सः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य च कृष्णाय़ां सत्याय़ां च महात्मनः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य च सैन्यानां विग्रहस्तुमुलोऽभवत् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य तदानेन सङ्गृहीता हय़ोत्तमाः ||
१४ ख