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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
न येषां धारय़ित्वा तान्कश्चिदस्ति फलागमः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
न येषां वान्धवाः सन्ति ये चान्येषां न वान्धवाः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
धृतराष्ट्र उवाच
न येषां सन्ति कर्तारो न च येऽत्राहिताग्नय़ः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
न योक्ष्यति हि मे शीलं तव भृत्यैः पुरातनैः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं वभूव ह ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
न योत्स्ये पाण्डवान्सङ्ख्ये नापि पार्षतसात्यकी ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
न योनिपोषो वर्तेत न कृषिर्न वणिक्पथः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च संनतिः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
न योऽभ्यसूय़त्यनुकम्पते च; न दुर्वलः प्रातिभाव्यं करोति |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
न रक्षति प्रजाः सम्यग्यः स पार्थिवतस्करः ||
९६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
न रक्षेद्यदि कृष्णस्तं पार्थं कर्णान्महारथात् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राक्षस उवाच
न रक्षोभ्यो भय़ं तेषां कुत एव तु मानुषात् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
न रक्ष्यते त्वय़ा चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नाय़ुधेन च |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
न रज्यति च कल्याणे यस्त्यजेत्तादृशं नरम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
न रत्नानि परार्ध्यानि न भूर्न द्रविणागमः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
न रथा रथिभिः सार्धं न पदाताः पदातिभिः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
व्राह्मण उवाच
न रसानधिगच्छन्ति जिह्वा तानधिगच्छति ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
द्रौपद्यु उवाच
न राजन्राजवत्किञ्चित्समाचरसि कीचके |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
न राजलक्षणत्यागो न पुरस्य तपोधनाः |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
न राजसूय़ैर्वहुभिरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
न राजानं मृषा गच्छेन्न द्विजातिं कथञ्चन |
७२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
व्राह्मण उवाच
न राज्ञां प्रतिगृह्णामि शक्तोऽहं स्वस्य मार्गणे |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
न राज्यं कामय़े राजन्न धनं न च योषितः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न राज्यमनमात्येन शक्यं शास्तुममित्रहन् ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
न राज्यलाभो विपुलः शत्रूणां वा पराभवः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
न राज्यहरणं दुःखं द्यूते चापि पराजय़ः |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
न राज्ये न च नारीषु न वेदाध्ययने तथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
न राम कालः परिदेवनाय़; यदुत्तरं तत्र तदेव सर्वे |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
न रिपून्वै समुद्दिश्य विमुञ्चन्ति पुरा शरान् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
न रुजं जनय़िष्यन्ति गिरेरिव नदीरय़ाः ||
१३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
न रूपं दृश्यते तस्य संस्थानं वा कथञ्चन |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
न रूपमनृतस्यास्ति नानृतस्यास्ति सन्ततिः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते; नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
व्राह्मण उवाच
न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
न रोचते मे सङ्ग्रामो हैडिम्वेन दुरात्मना |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथञ्चन |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
धृतराष्ट्र उवाच
न रोचय़े ज्ञातिवधं द्रष्टुं व्रह्मर्षिसत्तम |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
न रोचय़े स्वर्गवासं विना देहादहं विभो |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
अष्टावक्र उवाच
न रोचय़े हि व्युत्थानं धृत्यैवं साधय़ाम्यहम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
न लता वर्धते जातु अनाश्रित्य महाद्रुमम् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
न लता वर्धते जातु महाद्रुममनाश्रिता ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते ||
८० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
न लभामि सुखं वीर साद्य जीवामि पश्य माम् ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
न लभे वै क्वचिच्छान्तिं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
न लभे शर्म तं राजन्स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
न लभेद्धर्मसंश्लेषं हतविप्रहतो जनः |
२८ क