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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
न लिप्यते कर्मफलैरनिष्टैः; पत्रं विसस्येव जलेन सिक्तम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
न लिप्यन्ते पापकृत्यैः कदाचित्कर्मय़ोनितः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
न लुव्धो वुध्यते दोषान्मोहाल्लोभः प्रवर्तते |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
न लेभाते तु तौ द्वारं वारितौ कृतवर्मणा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
न लेभिरे च तस्मात्ते प्रसादमृषिसत्तमात् |
३५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
न लेभे स तु निद्रां वै दह्यमानोऽतिमन्युना |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
न लोकान्न पुनः कामान्न देवत्वं कुतः सुखम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
न लोके दीप्यते मूर्खः केवलात्मप्रशंसय़ा |
३० क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
न लोके राजते मूर्खः केवलात्मप्रशंसय़ा |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
न लोभादर्थसम्पत्तिर्नराणामिह दृश्यते |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
न वः प्रिय़तरं कार्यं धनं कस्याञ्चिदापदि ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
न वक्तारं पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
न वक्ष्यामि न वक्ष्यामीत्येवं मे मनसि स्थितम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न वधः पुरुषेन्द्रस्य समरेष्वपलाय़िनः ||
८४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
न वधः पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मतः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
न वधः पूज्यते वेदे हितं नैतत्कथञ्चन ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
न वधार्थं प्रदातव्या न कीनाशे न नास्तिके |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
न वधार्थं सुदुर्धर्ष वरमद्य प्रय़ाचसि ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
न वनूनभिय़ुञ्जीत यौगपद्येन शात्रवान् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
न वन्धुषु निवन्धस्ते न भय़ेष्वस्ति ते भय़म् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
न वभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
न वभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
न वभूव भय़ं किञ्चिद्देवेभ्योऽपि कथञ्चन ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
न वभौ दानवपुरं हतत्विट्कं हतेश्वरम् ||
५८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
न वभौ भास्करश्चापि सोमः श्रीमुक्तमण्डलः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
न वराहं न चोक्षाणं न मृगान्विविधांस्तथा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
न वर्गस्था व्रवीम्येतत्स्वपक्षपरपक्षय़ोः |
१८८ क
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
न वर्णसङ्करकरो नाकृष्यकरकृज्जनः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
न वर्तन्ते नरश्रेष्ठ व्रह्म चात्र प्रलीय़ते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
न वर्तय़न्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
न वर्षं विषमं वापि दुःखमासां भवत्युत ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
न वर्षति च यो मेघः सर्व एते निरर्थकाः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
न वलं योगय़ोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
न वलं वलिनां मध्ये वलं भवति कौरव |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
न वलस्थोऽहमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
न ववर्ष सहस्राक्षः प्रतिलोमोऽभवद्गुरुः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
न ववर्ष सहस्राक्षस्ततोऽपीड्यन्त वै प्रजाः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
न ववर्ष सहस्राक्षो राष्ट्रे चैवास्य सर्वशः ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
न ववौ पवनश्चैव नाग्निर्जज्वाल चैधितः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
न वव्रे पुरुषः कश्चिद्भय़ात्तस्य महात्मनः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
न वशं यज्ञशीलस्य गच्छेदेष वरारिहन् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
न वशे कस्यचित्तिष्ठन्सधर्मा मातरिश्वनः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
न वशे कस्यचित्तिष्ठन्सधर्मा मातरिश्वनः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
न वा पात्रेण वा गूहेदन्तर्धानेन वा चरेत् |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
न वाग्घीने विवर्णे वा नाङ्गहीने न वामने ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
न वाचं दूषय़िष्यामि सत्यं रक्ष स्थिरो भव ||
५५ ख