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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
न वाच्यं तस्य वैगुण्यं प्रतिज्ञां परिरक्षता ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
न वाच्यः परिवादो वै न श्रोतव्यः कथञ्चन |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
न वाणैः पातय़ामास सोऽर्जुनेन निपातितः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
न वाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुदाचरेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
न वान्धवा न च वित्तं न कौली; न च श्रुतं न च मन्त्रा न वीर्यम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
न वामनाः कुव्जकृशा न खञ्जा; नान्धा जडाः स्त्री न नपुंसकं च |
५३ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
न वार्यो व्यवसाय़ो मे विदुरैतद्व्रवीमि ते |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
न वार्ष्णेय़स्यापराधो भवितव्यं हि तत्तथा |
४० क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
न वाल इत्यवमन्तव्यमाहु; र्वालोऽप्यग्निर्दहति स्पृश्यमानः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
न वाल एव म्रिय़ते तदा कश्चिन्नराधिप |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
न वालिशा न च क्षुद्रा न चाप्रतिमितेन्द्रिय़ाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
न वाष्पमशकत्सोढुं प्ररुरोद च भारत ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
न वाससां न रामाणां नापां स्पर्शस्तथा सुखः |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् |
१३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
न वासुदेवात्त्वत्तो वा पाण्डवेय़ विभेम्यहम् ||
६४ ग
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
न वासय़ेत्पारवर्ग्यं द्विषन्तं; विशेषतः क्षत्तरहितं मनुष्यम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
न वाहुल्येन सेनाय़ा जय़ो भवति भारत |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३
सहदेव उवाच
न वाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
न वाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
न वाय़ुर्वाति देवेशे तपश्चरति दुश्चरम् ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
न विकर्णे न काम्वोजे न कृपे न च वाह्लिके ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
न विग्रहं रोचय़ते वलस्थैः; काले च यो विक्रमते स धीरः ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
न विग्रहः कुतस्तन्द्री न द्वेषो नापि वैकृतम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
न विग्रहे मम मतिर्न च प्रीय़े कुरुक्षय़े |
९७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
न विचाल्येत युक्तात्मा निःस्पृहः शान्तमानसः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
न विचेरुस्तदाकाशे भूतान्याकाशगान्यपि ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
न विजेतुं रणे भीष्म उत्सहेत धनुर्धरम् ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
न विज्ञातं वलं देव मय़ा ते परमं विभो |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
न विज्ञाने न विज्ञेय़े नाज्ञाने शर्म विद्यते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि ||
७५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
न विट्शूद्रस्य तत्रैव शृणु वाक्यं ममानघ ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
न वित्तेन न पारुष्यैर्न सान्त्वेन न च श्रुतैः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
न विदुर्यस्य निधनमादिं वा सूक्ष्मदर्शिनः |
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
न विदुस्त्वां तु तत्त्वेन कुतो वेत्स्यामहे वय़म् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
न विदुस्त्वामिति ततस्तुष्टः प्रोवाच तं शिवः ||
६७ ख
आदि पर्व
अध्याय २२२
शार्ङ्गका ऊचुः
न विद्म वै वय़ं मातर्हृतमाखुमितः पुरा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
न विद्यते कवेः किञ्चिदभिज्ञानप्रय़ोजनम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
न विद्यते जाम्ववतीसुतस्य; रणेऽविषह्यं हि रणोत्कटस्य ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
न विद्यते तस्य गतिर्महीपते; र्न विद्यते राष्ट्रजमुत्तमं सुखम् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
दुर्योधन उवाच
न विद्यते मे गाङ्गेय़ भय़ं देवासुरेष्वपि |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १३१
लोमश उवाच
न विद्यते यदा मांसं कपोतेन समं धृतम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
न विद्यते युक्तिरेतस्य का चि; न्नैवंविधाः स्याम यथा प्रिय़ं ते |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
न विद्यते व्यवस्थानं कृष्णय़ोः क्रुद्धय़ोः क्वचित् |
५३ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
न विद्यते सन्धिरथापि विग्रहो; मृतैर्मर्त्यैरिति लोकेषु निष्ठा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
न विद्यतेऽभ्युपाय़श्च कश्चिन्मे प्राणधारणे ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न वान्धवाः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
न विद्यां प्राप्नुय़ात्कश्चिद्यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
न विद्वान्विद्यया हीनं वृत्त्यर्थमुपसंश्रय़ेत् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः |
१० क