भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शाल्वाश्रय़ास्त्रिगर्ताश्च अम्वष्ठाः केकय़ैः सह |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
शाल्वेय़ाः शूरसेनाश्च सर्वे त्वामवजानते |
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
शाल्वेय़ानां च राजानः सोदर्यानुचरैः सह |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
शाल्वैः समत्स्यैः कुरुमध्यदेशै; र्म्लेच्छैः पुलिन्दैर्द्रविडान्ध्रकाञ्च्यैः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
शाल्वो वैहाय़सं चापि तत्पुरं व्यूह्य विष्ठितः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
शालय़श्च कदन्नं च यस्य स्यान्मुक्त एव सः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं व्रह्म चाव्ययम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
शाश्वतं धर्ममुत्सृज्य गुरुः शिष्येण घातितः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
शाश्वतं वेदपठितं धर्मं च युय़ुजे पुनः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
शाश्वतं वैष्णवं धीमान्ददृशे यद्धनञ्जय़ः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
शाश्वतं व्रह्म परमं ध्रुवं ज्योतिः सनातनम् |
१९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
शाश्वतं सुखमत्यन्तमन्विच्छन्स सुदुर्लभम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
शाश्वतं स्थानमचलं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
जरत्कारुरु उवाच
शाश्वतं स्थानमासाद्य मोदन्तां पितरो मम ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
शाश्वतत्वं महावाहो यथावद्भरतर्षभ ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
शाश्वतत्वादनन्तश्च गोविन्दो वेदनाद्गवाम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां ग्रसत्यद्यापि चैव तौ ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
शाश्वतस्याव्ययस्याथ पदस्य ज्ञानमुत्तमम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
शाश्वतात्तमसः पुरुषः प्रादुर्भूतो हरिरव्ययः ||
३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
शाश्वतोऽय़ं धर्मपथः सद्भिराचरितः सदा |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
शाश्वतोऽय़ं भूतिपथो नास्यान्तमनुशुश्रुम |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
श्रीकृष्ण उवाच
शाश्वतोऽय़ं स्थितो धर्मः क्षत्रिय़ाणां धनञ्जय़ |
९६ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
शासतैनानधर्मज्ञान्मम विप्रिय़कारिणः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
शासनं धृतराष्ट्रस्य सर्वं कृत्वा महात्मनः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
शासनं सततं चक्रुस्तथैव भरतर्षभाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
शासनात्तव देवेश समाज्ञापय़ नो विभो ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
शासनात्तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
शासनात्पुरुहूतस्य निर्मितो विश्वकर्मणा ||
४२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
शासनाद्धर्मराजस्य क्षत्ता सूतश्च सञ्जय़ः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
शासनाद्धृतराष्ट्रस्य तत्रोपाविशदच्युतः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
शासनाद्धृतराष्ट्रस्य दुर्योधनममर्षणम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
शासनाद्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः शान्तनवस्य च ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
शासनाद्राक्षसेन्द्रस्य निजघ्नू रथकुञ्जरान् ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शासने नित्यसंय़ुक्तं दुःशासनमनन्तरम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
शासनेऽधिष्ठिताः सर्वे किं कुर्म इति वादिनः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
शासितास्म्यद्य ते वाणैः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
शास्ता च न हि नः कश्चित्त्वामृते भरतर्षभ ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रं न शास्ति दुर्वुद्धिं श्रेय़से वेतराय़ वा ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
शास्त्रं प्राज्ञस्य वदतः समूहे यात्यदर्शनम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
शास्त्रं यदि भवेदेकं व्यक्तं श्रेय़ो भवेत्तदा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
शास्त्रं व्राह्मणमन्त्रश्च शास्ता प्राग्वचनं गतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
शास्त्रं ह्यवुद्ध्वा तत्त्वेन केचिद्वादवला जनाः |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
शास्त्रचक्षुरवेक्षस्व नमस्ते भरतर्षभ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रजां वुद्धिमास्थाय़ नैनसा स हि युज्यते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शास्त्रज्ञमभिसन्धाय़ नूनं भक्षय़िताद्य माम् ||
१६२ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
शास्त्रज्ञैरलमर्थज्ञैर्नीत्यां च परिनिष्ठितैः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यं तमूचुर्विप्रा युधिष्ठिरम् |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रदृष्टः परो धर्मः स्मृतो गार्हस्थ्य आश्रमः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
शास्त्रदृष्टानवध्यान्यः समतीत्य जिघांसति |
२० क