शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
न विना गुरुसम्वन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
न विना ज्ञानविज्ञानं मोक्षस्याधिगमो भवेत् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
न विना धातुसङ्घातं शरीरं भवति क्वचित् |
३४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
न विना भ्रातृभिः स्वर्गमिच्छे गन्तुं सुरेश्वर ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
न विनाशमिदं गच्छेत्त्वत्तेज इति निश्चय़ात् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
न विन्दामि महावाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रिय़ं प्राणधनेश्वरम् ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
न विन्दे दृढमात्मानं दृष्ट्वाहं तदरेर्धनम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
कर्ण उवाच
न विप्रिय़ं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न विभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
न विभीषय़ते कञ्चिद्भीषितो न विभेति च ||
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
युधिष्ठिर उवाच
न विभेति कथं सा स्त्री शापस्य परमद्युतेः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
न विभेति परो यस्मान्न विभेति पराच्च यः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
न विभेति यदा चाय़ं यदा चास्मान्न विभ्यति |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
न विभेति यदा चाय़ं यदा चास्मान्न विभ्यति |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
न विभेषि हिडिम्वे किं मत्कोपाद्विप्रमोहिता ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
न विमानय़ितव्याश्च राज्ञा वृद्धिमभीप्सता ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
न विमुञ्चति मां शोको ज्ञातिघातिनमातुरम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
न विमोक्ष्यन्ति कौन्तेय़ यद्यपि स्युर्मनोजवाः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
न विरज्यन्ति मित्रेभ्यो वासो रक्तमिवाविकम् ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
न विवाहाः समाजा वा यदि राजा न पालय़ेत् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
न विवेक्तुं च ते प्रश्नमेतं शक्नोमि निश्चय़ात् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे च निर्भिन्नो द्रौणिर्गाण्डीवधन्वना |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे ततो द्रोणः स्मय़न्नेवान्वय़ुध्यत ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे भारत तत्र कर्णः; प्रतीपमेवार्जुनमभ्यधावत् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे भीमसेनो भिद्यमान इवाचलः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे महावाहुर्भिद्यमान इवाचलः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे राक्षसेन्द्रो भिद्यमान इवाचलः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे शान्तनवो महात्मा; समागतैः पाण्डुसुतैः समस्तैः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
न विव्यथे सूतपुत्रो न च त्रासमगच्छत ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
न विव्रुवन्ति कौरव्याः प्रश्नमेतमिति स्म ह |
५० क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
न विव्रुवन्त्यार्यसत्त्वा यथाव; त्पतींश्च ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
न विशेषं प्रपश्यामि रणे गाण्डीवधन्वनः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
न विशेषं विजानन्ति पुरस्य शिविरस्य वा |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
न विशेषस्तदा राजँल्लक्ष्यते स्म महात्मनोः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
न विशेषस्तय़ोर्युद्धे तदा कश्चन दृश्यते |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
न विशेषोऽस्ति मे पुत्र त्वय़ि तेषु च पार्थिव |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं व्राह्ममिदं जगत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न विश्वसन्ति चान्योन्यं युगान्ते पर्युपस्थिते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
न विश्वसेच्च नृपतिर्न चात्यर्थं न विश्वसेत् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नापि विश्वसेत् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् |
१३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न विश्वासाज्जातु परस्य गेहं; गच्छेन्नरश्चेतय़ानो विकाले |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
न विषादस्त्वय़ा कार्यः कर्णं वैकर्तनं प्रति |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न विषादस्त्वय़ा कार्यो भीष्म काशिसुतां प्रति |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
कुन्त्यु उवाच
न विषादस्त्वय़ा कार्यो भय़ादस्मात्कथञ्चन |
१ क