वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
न विषादे मनः कार्यं विषादो विषमुत्तमम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
न विषादोऽत्र कर्तव्यः सर्वमेतत्सुखाय़ वः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
न विषेहुस्तदा राजन्दुद्रुवुस्ते समन्ततः |
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
न विस्मय़स्ते नृपते यज्ञे कार्यः कथञ्चन |
९२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
न विहन्त्येतदस्त्रं ते प्रजाहितचिकीर्षय़ा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
न विय़ोनिं व्रजन्त्येते स्नातास्तीर्थे महात्मनः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
न वीरपत्नीं विहरेत नारीं; न चापि नारीमनृतावाह्वय़ीत |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
न वुद्धवानसि विभो प्रोच्यमानं हितं तदा ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
न वुद्धिभेदं जनय़ेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
न वुद्धिर्धनलाभाय़ न जाड्यमसमृद्धय़े |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
न वुद्धिर्धनलाभाय़ न जाड्यमसमृद्धय़े |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
न वुद्धिर्वुध्यतेऽव्यक्तं सूक्ष्मस्त्वेतानि पश्यति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
न वुद्धिशास्त्राध्ययनेन शक्यं; प्राप्तुं विशेषैर्मनुजैरकाले |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
न वुध्यते नाथवतीमिहाद्य; वहिश्चरं हृदय़ं पाण्डवानाम् ||
१३ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
न वुध्यसे त्वं दुर्वुद्धे भीमसेनममर्षणम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
न वुध्यसे पुरा यत्तत्तथ्यमुक्तं वचो महत् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
धृतराष्ट्र उवाच
न वुभूषेद्भवेनार्थी गतश्रीरपि पार्थिवः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
न वुवोध हतं सूतं स राजा वाहुशालिना |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
न वुवोध हि तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
न वृत्तं मन्यतेऽन्यस्य मन्यतेऽन्यस्य पापकम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रय़ोजय़ेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न वृत्त्या परितुष्यन्ति राजदेय़ं हरन्ति च |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
न वृथा प्रतिगृह्णीय़ान्न च दद्यात्कथञ्चन ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मय़ा तद्भविष्यति ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
न वृषाः सम्प्रवर्तेरन्न मथ्येरंश्च गर्गराः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
न वृष्णीनपि तानन्यान्स्ववाहुवलमाश्रितः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
न वेगं धारय़ामासुर्गदावेगस्य वेगिताः ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
न वेगः सुसहो राजंस्तस्मान्नात्यनुसारय़ेत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
गौतम उवाच
न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रय़ोजनम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते |
१०० क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
न वेद परिमाणं वा संस्थानं वापि भारत |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
न वेदनिष्ठस्य जनस्य राज; न्प्रदेय़मेतत्परमं त्वय़ा भवेत् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
न वेदवचनात्तात न लोकवचनादपि |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथञ्चन ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
न वेदाननुवर्तन्ति व्रतवन्तो द्विजातय़ः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
न वेदानां परिभवान्न शाठ्येन न माय़या |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
न वेदानां परिभवान्न शाठ्येन न माय़या |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति; कश्चिद्वेदान्वुध्यते वापि राजन् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
न वेदय़ज्ञाध्ययनैर्न दानै; र्न च क्रिय़ाभिर्न तपोभिरुग्रैः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
न वै कन्या न युवतिर्नामन्त्रो न च वालिशः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
न वै किञ्चिद्व्यापतत्तत्र भूतं; तमोभूते साय़कैरन्तरिक्षे ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
न वै क्रोधाद्व्याधिनैवोत्तमेन; संय़ोजय़ द्वारपाल क्षणेन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
न वै चरसि यच्छ्रेय़ आत्मनो वा यदीहसे |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
न वै तेषां स्वदते पथ्यमुक्तं; योगक्षेमं कल्पते नोत तेषाम् |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
न वै देवा हीनसत्त्वेन तोष्याः; सर्वाशिना दुष्कृतकर्मणा वा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
न वै देय़मनुक्रोशाद्दीनाय़ाप्यपकारिणे |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
न वै द्विषन्तः क्षीय़न्ते राज्ञो नित्यमपि घ्नतः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
९५
अगस्त्य उवाच
न वै धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
९२
युधिष्ठिर उवाच
न वै निर्गुणमात्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम |
१ क