आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
न व्रवीम्युत्तरे मिथ्या सत्यमेतद्भविष्यति |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न व्रह्मचार्यधीय़ीत कल्याणी गौर्न दुह्यते |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
न व्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षय़न्त्युत |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
न व्रह्महा मनसापि प्रपश्ये; द्गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न व्रह्माणं न धातारं न पूषाणं कथञ्चन ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
न व्राह्मणं परीक्षेत दैवेषु सततं नरः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
न व्राह्मणः साधय़ते हव्यं दैवात्प्रसिध्यति |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
न व्राह्मणविरोधेन शक्या शास्तुं वसुन्धरा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
न व्राह्मणा न च लोकादिकर्ता; न सद्धर्मा नादिधर्मा भवेय़ुः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
न व्राह्मणानां कोपोऽस्ति कुतः कोपाच्च यातना |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न व्राह्मणान्परिवदेन्नक्षत्राणि न निर्दिशेत् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
न व्राह्मणान्यातय़ेत दोषान्प्राप्नोति यातय़न् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
न व्राह्मणान्वेदय़ेत कश्चिद्राजनि मानवः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
न व्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
न व्राह्मणोपरोधेन हरेदन्यः कथञ्चन ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
न वय़ं तत्प्रहास्यामो यस्मिन्योक्ष्यति नो भवान् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
न वय़ं त्वामृते वीर रंस्यामेह कथञ्चन |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
न वय़ं रासाय़निकाः शरीरोपतापेनात्मनः समारभामहेऽर्थानामनुष्ठानम् ||
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
व्राह्मणा ऊचुः
न वय़ं व्रूम धर्मात्मन्व्येतु ते भय़मीदृशम् |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्तः पाण्डवादन्यः साक्षादपि शतक्रतुः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्तः संय़ुगे हन्तुं साक्षादपि शतक्रतुः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
न शक्तस्तानि मघवान्भेत्तुं सर्वाय़ुधैरपि |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद्धारय़ितुं नृप |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं नूनं भीमस्य सञ्जय़ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्ताः स्युर्निहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवताः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
न शक्तो विवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रिय़ः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथाय़ुक्तं नरर्षभम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभृतां वर ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
न शक्नुवन्ति यन्तारः संय़न्तुं तुमुले हय़ान् ||
४८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
न शक्नुवन्ति विवशा निवर्तय़ितुमातुराः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्नुवन्ति सैन्यानि पाण्डवं प्रतिवीक्षितुम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
न शक्नुवन्त्यवस्थातुं पीड्यमानाः शरार्चिषा ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
न शक्नुय़ाम चरितुं धर्मं पुत्र यथासुखम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्नोमि निय़न्तुं वा कर्तुं वा हितमात्मनः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्नोम्यात्मनात्मानमहं धारय़ितुं शुभे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
अम्वो उवाच
न शक्यं काशिनगरीं पुनर्गन्तुं पितुर्गृहान् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यं तन्मय़ा भूय़स्तथा वक्तुमशेषतः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यं परिसङ्ख्यातुं वर्षाणामय़ुतैरपि |
१०६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
न शक्यं परिसङ्ख्यातुं वहुत्वाद्वेदवित्तम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
न शक्यं पुनरादातुं वान्तमन्नमिव त्वय़ा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
न शक्यं मृदुना वोढुमाघातस्थानमुत्तमम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
न शक्यं विस्तरात्कृत्स्नं वक्तुं शर्वस्य केनचित् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
न शक्यः पाण्डवो जेतुं देवैरपि सवासवैः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यः सहितुं वेगः पर्वतैरपि संय़ुगे ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यते जीवितुमन्यकर्मणा; न च त्वदन्यो मम रोचते नृपः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
न शक्यन्ते महाराज योधा वारय़ितुं तदा ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यन्ते ह्यस्य गुणाः प्रसङ्ख्यातुं नरेश्वर |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
न शक्यमनमात्येन महत्त्वमनुशासितुम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यमन्यथा कर्तुं यदुक्तं व्रह्मवादिना ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
न शक्यमन्यथा गन्तुं पुरुषं तमथो द्विजाः ||
६ ग