द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
न शान्तिमुपजग्मुर्हि तप्यमानैर्जलाशय़ैः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
न शापं प्राप्स्यते घोरं गच्छ तेऽऽज्ञां करिष्यति ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
न शास्ता विद्यतेऽस्माकमन्यस्तस्मात्सुरेश्वरात् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
न शिल्पजीविकां जीवेद्द्विरन्नं नोत कामय़ेत् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
न शुश्रुम यदन्यस्य लिङ्गमभ्यर्च्यते सुरैः ||
१०० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
न शुश्रूषसि यद्वाक्यं मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
न शुष्कवैरं कुर्वीत न वाहुभ्यां नदीं तरेत् |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
न शुष्केण न चार्द्रेण नाश्मना न च दारुणा |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
न शूराः प्रहरन्त्याजौ न राज्ञे पार्थिवास्तथा |
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
न शृणोति न चाघ्राति न रस्यति न पश्यति |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
न शृणोमि न पश्यामि नात्मनो वेद्मि कारणम् ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
न शृणोषि महाराज सारसीनामिवार्णवे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भरद्वाज उवाच
न शृण्वन्ति न पश्यन्ति न गन्धरसवेदिनः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं तपन्तमिव भास्करम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं श्वेतग्रहमिवोदितम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः पाण्डवीं सेनां पाल्यमानां किरीटिना ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः पाण्डवेय़स्य योधा भीष्मं निरीक्षितुम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
न शेकुः पाण्डुपुत्राणां समीपे परिवर्तितुम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः पार्थिवाः सर्वे चक्षुर्भिरभिवीक्षितुम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः प्रमुखे स्थातुं तस्य शत्रुनिषूदनाः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः प्रमुखे स्थातुं भारद्वाजस्य पाण्डवाः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः समरे क्रुद्धं सौभद्रमरिसूदनम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः सर्वतो योधाः प्रतिवीक्षितुमन्तिके ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः सर्वभूतानि पाण्डवं प्रतिवीक्षितुम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
न शेकुः सहसा गन्तुं सह मात्रा परन्तपाः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः सृञ्जय़ा द्रष्टुं तथैवान्ये महीक्षितः ||
३३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न शेकुः सृञ्जय़ा राजंस्तद्धि द्रोणेन पालितम् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
न शेकुरभिसंरव्धाः शूरान्कर्तुं पराङ्मुखान् ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
न शेकुरावर्तय़ितुं ह्रिय़माणं च तं जनम् ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
न शेकुर्भारतं युद्धे पाण्डवाः समवेक्षितुम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
न शेकुश्चलितुं केचित्संनिपत्य रथा रथैः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न शेकुस्तं तदा युद्धे प्रत्युद्यातुं महारथम् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
न शेकुस्त्रिदशाः सोढुं ते भग्नाः प्राद्रवन्भय़ात् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
न शेते वसतीः सर्वा दुःखाच्छकुनिना सह ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
न शेते वसतीः सर्वा धृतराष्ट्रो महामुने ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न शेषं नानुकल्पेन निष्कारणमहेतुकम् ||
८९ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
न शेषमिह पश्यामि तदा सैन्यस्य सञ्जय़ ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
न शेषय़ेतां युधि शत्रुसेनां; शरान्किरन्तावशनिप्रकाशान् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
न शेषय़ेय़ुः समरे वाय़ुय़ुक्ता इवाग्नय़ः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
न शोकः शोचमानस्य विनिवर्तेत कस्यचित् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न शोको न जरा तत्र नाय़ासपरिदेवने ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
न शोको न जरा तस्यां क्षुत्पिपासे न चाप्रिय़म् |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
न शोचञ्श्रिय़माप्नोति न शोचन्विन्दते परम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
न शोचामि च वै विद्वन्कालाकाङ्क्षी स्थितोऽस्म्यहम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम् ||
१६ ख