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वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किञ्चन |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत्तथा |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
न शोचितव्यं पश्यामि त्वय़ा धर्मभृतां वर ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
न शोचितव्यं भवता पश्यामीह जनाधिप ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वन्तः स पृथिवीपतिः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
न शोचितव्यं विदुषा शोकः कार्यविनाशनः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
धृतराष्ट्र उवाच
न शोच्यः पाण्डुरनघः प्रशस्यः स नराधिपः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
न शोच्यः पुरुषव्याघ्रस्तथा स निधनं गतः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
न शोच्यः स नरव्याघ्रो युद्धे हि निधनं गतः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
न शौचमनुरुध्यन्त तेषां सूदजनास्तथा |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
न शौद्रं कर्म कर्तव्यं व्राह्मणेन विपश्चिता |
७ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
न शौरिणा विना पार्थो न शौरिः पाण्डवं विना |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
न श्रद्दधाति कल्याणं परेभ्योऽप्यात्मशङ्कितः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न श्राद्धैर्हि पितॄंश्चापि तर्पय़िष्यन्ति मानवाः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मय़ः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
न श्रीर्वसत्यदान्तेषु ये चोत्साहविवर्जिताः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
न श्रुतेन न दानेन न सान्त्वेन न चेज्यया |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
न श्रूय़न्तेऽद्य ते सर्वे सैन्धवस्य निवेशने ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
न श्रेय़ः सततं तेजो न नित्यं श्रेय़सी क्षमा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
न श्रेय़सा योक्ष्यति तादृशे कृतं; धर्मप्रवक्तारमपात्रदानात् ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
विदुर उवाच
न श्रेय़से नीय़ते मन्दवुद्धिः; स्त्री श्रोत्रिय़स्येव गृहे प्रदुष्टा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
न श्रेय़से नीय़तेऽजातशत्रो; स्त्री श्रोत्रिय़स्येव गृहे प्रदुष्टा |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
मन उवाच
न श्रोत्रं वुध्यते शव्दं मय़ा हीनं कथञ्चन |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
न श्रोत्रलिङ्गं श्रवणे निदर्शनं; तथागतं पश्यति तद्विनश्यति ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
न श्वा स्वस्थानमुत्क्रम्य प्रमाणमभि सत्कृतः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
न शय़्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
न स कामय़ते धर्मं न स कामय़ते यशः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
न स किञ्चिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १४९
कुन्त्यु उवाच
न स कुर्यात्तय़ा कार्यं विद्ययेति सतां मतम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
न स क्षय़ो महाराज यः क्षय़ो वृद्धिमावहेत् |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
अश्वत्थामो उवाच
न स जातः पुमाँल्लोके कश्चिन्न च भविष्यति |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
न स जातु महावाहुर्भारमुद्यम्य सीदति ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
न स जातु वशे तस्थौ मम वालोऽपि सञ्जय़ |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
न स जातु सुखं जीवेत्त्वय़ि क्रुद्धे परन्तप ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
न स जातो जनिष्यो वा पृथिव्यामिह कश्चन |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
न स जेय़ो मनुष्येण मा स्म कृध्वं मनो युधि ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
न स तं चिन्तय़ामास सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२
अर्जुन उवाच
न स तं जीवलोकेऽस्मिन्कामं प्राप्तः कथञ्चन ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तय़न् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
न स तस्य फलं प्रेत्य भुङ्क्तेऽर्थस्य दुरागमात् ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
न स तां प्रतिजग्राह न सनाम्नीति चिन्तय़न् ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
न स तावत्प्रवेक्ष्यामि पुरं ते पृथुलोचन ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशय़म् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
न स दुःखाय़ भवति तथा दृष्टो हि स द्विजः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
न स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय २६०
व्रह्मो उवाच
न स देवासुरैः शक्यो युद्धे जेतुं विभावसो |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
न स धर्मं न चाप्यर्थं परिगृह्णाति वालिशः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
न स धर्ममवाप्नोति इह लोके परत्र च ||
३१ ख