शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
न सङ्करेण द्रविणं विचिन्वीत विचक्षणः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
न सङ्कीर्येत धर्मोऽय़ं पृथिव्यां पृथिवीपते |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
न सङ्ख्यां न परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
न सज्जते कर्मसु भोगजालं; दिवीव सूर्यस्य मय़ूखजालम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
न सज्जते शैलवनस्पतिभ्य; ऊर्ध्वं तिर्यग्योजनमात्ररूपः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
न सतो नासतो राजन्स ह्यरण्येषु गोपतिः ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
न सत्यं वेद वै कश्चित्क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
अर्जुन उवाच
न सत्याद्विचलिष्यामि सत्येनाय़ुधमालभे ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
न सत्सु लभते पूजां यज्ञे मूर्ख इवागतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
न सद्योऽरीन्विनिर्हन्याद्दृष्टस्य विजय़ोऽज्वरः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
४९
आस्तीक उवाच
न सन्तापस्त्वय़ा कार्यः कथञ्चित्पन्नगोत्तम |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
न सन्तापस्त्वय़ा कार्यः कार्यं प्रति भुजङ्गमे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
न सन्तापस्त्वय़ा कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
पितामह उवाच
न सन्तापो न भीः कार्या शोको वा सुरसत्तमाः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
मन्दपाल उवाच
न सन्तापो हि वः कार्यः पुत्रका मरणं प्रति |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
न सन्ति यस्य वारकाः कुरुष्व धर्मसंनिधिम् ||
६६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा; इत्येव ये भावितवुद्धय़ः सदा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
न सन्ति सर्वे पुत्रा मे मूढा दुर्द्यूतदेविनः |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
धृतराष्ट्र उवाच
न सन्ति सूत कौरव्या इति मे नैष्ठिकी मतिः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
न सन्तीमे धार्तराष्ट्रा येषां त्वमनुशासिता |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
न सन्त्यक्ष्यति कौन्तेय़ान्राज्यदानैरपि ध्रुवम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
न सन्त्यजत्यात्मकर्म यन्न जीर्यति जीर्यतः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न सन्त्याज्यं च ते धैर्यं कदाचिदपि पाण्डव |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
न सन्दधन्न चाप्यस्यन्न विमुञ्चन्न चोद्धरन् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
न सन्दधन्विमुञ्चन्वा मण्डलीकृतकार्मुकः |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
न सन्दधानं ददृशे नाददानं च तं तदा |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
न सन्दधानो न तथा शरोत्तमा; न्प्रमुञ्चमानो रिपुभिः प्रदृश्यते |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
न सन्दुष्यति तत्कृत्वा न च ते दूषय़न्ति तम् |
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
न सन्देहो यथा युद्धमेकेनाभ्युपय़ास्यति ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
न सन्धत्ते द्विः शरं शल्य कर्णो; न मादृशाः शाठ्ययुक्ता भवन्ति ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
न सन्धातुमनीकानि न च राजन्पराक्रमे |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
न सन्धारय़ितुं शक्ता तव सेना जनाधिप |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
न सन्धिः शक्यते भेत्तुं वर्मवन्धस्य तस्य तु ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
न सभाय़ां जय़ो वृत्तो नापि तत्र पराजय़ः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
न समं सर्वमेवेति वुधानामेष निश्चय़ः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
न समक्षं गुणावेक्षि निर्गुणस्य निदर्शनम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
न समर्था हि मे पार्थाः स्थातुमद्य पुरो युधि ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
न समर्थानहं मन्ये गदाहस्तस्य संय़ुगे ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिताः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
न समानो व्राह्मणस्य यस्मिन्प्रय़तते स्वय़म् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९१
वसव ऊचुः
न सम्पत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु सन्ततिः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
न सम्पूर्णो न वा युक्तो निरय़ं सोऽधिगच्छति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
न सम्भ्रमं गन्तुमहं हि शक्ष्ये; त्वय़ा नृशंसेन विकृष्यमाणा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
न सम्भ्रमो न भीः काचिदास्था वा समजाय़त ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सूत उवाच
न सम्भ्रमो मे वार्ष्णेय़ विद्यते सत्यविक्रम |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
न सम्भ्रान्तस्तदा द्रौणिः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ||
३३ ग
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
न सम्वन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थं वा कथञ्चन ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
न सम्वुवुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
न सम्वुवुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
न सर्पो न च मण्डूको न चान्यः पापय़ोनिजः ||
१७ ख