वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
विप्राः समुद्राम्भसि मज्जितास्ते; वाचा जिता मेधय़ा आविदानाः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
विप्राणां व्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
विप्राणां संनिधौ श्लोकमगाय़दिदमच्युतः ||
३३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
विप्राणामतिथीनां च तेषां नित्यमवर्तत ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
विप्राणामनुकम्पार्थं दर्भिणा निर्मितं पुरा ||
१३३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
विप्रानुकम्पार्थमिदं तेन प्रोक्तं हि धीमता ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३
जनमेजय़ उवाच
विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतविक्रमम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विप्राश्च यतय़ो युक्ता जग्मुर्नागपुरं प्रति ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
विप्रिय़ं च जनस्यास्य संसर्गाद्धर्मजस्य वै |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
संवर्त उवाच
विप्रिय़ं तु चिकीर्षामि भ्रातुश्चेन्द्रस्य चोभय़ोः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रिय़ं पार्थिवेन्द्राणां नैष वध्यः कथञ्चन ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
विप्रिय़ं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
विप्रिय़ं ह्याचरन्मर्त्यो देवानां मृत्युमृच्छति |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
विप्रिय़ार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रिय़ेषु स्थितास्माकं वरदानेन मोहिताः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात् |
१२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
विप्रे गुणय़ुते दद्यात्स वै स्वर्गे महीय़ते ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
विप्रेक्ष्य सागरान्तां वै महीं सवनकाननाम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
विप्रेन्द्र यद्विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
विप्रेभ्यश्चापि वहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति नः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रेभ्यो धनरत्नानि ददौ स्नात्वा यथाविधि ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
विप्रैश्चोरक्षय़े चैव कृते क्षेमं भविष्यति ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
विप्रो भवति धर्मात्मा क्षत्रिय़ः स्वेन कर्मणा ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
विप्रो यदीच्छते दातुं प्रतीच्छतु च मे धनम् ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रो वेदानधीते यः स त्यागी गुरुपूजकः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रोषिता दीर्घकालमिमे चापि नरर्षभाः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
विप्रोऽस्मि मुक्तोऽस्मि वनेचरोऽस्मि; गृहस्थधर्मा व्रह्मचारी तथास्मि ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विप्रय़ातरथानीकाः समपद्यन्त पाण्डवाः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
विप्रय़ातांस्तु वो भिन्नान्पाण्डवाः कृतकिल्विषान् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
विप्रय़ुक्तश्च मन्दात्मा भ्रमत्यसुखपीडितः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
विप्रय़ोगात्तु सर्वस्य न शोचेत्प्रकृतिस्थितः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रय़ोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमात् |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
विप्लुता चास्य भद्रं ते वुद्धिर्वुद्धिमतां वर |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
विप्लुते नरलोकेऽस्मिंस्ततो व्रह्म ननाश ह |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
विफलं क्रिय़माणं तत्सम्प्रेक्ष्य च शतक्रतुः |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
विफला मे कृताः कृष्ण हृदि सर्वे मनोरथाः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
विभक्तभावो न वभूव कश्चि; दहर्निशानां पुरुषप्रवीर ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
विभक्षय़िषता मांसं युष्माकममरोपम ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
विभक्षय़िषवो राजन्सहसा प्राद्रवंस्तदा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
विभजन्सर्वभूतानामाय़ुः कर्म च भारत |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
विभज्य काले कालज्ञ सदा वरद सेवसे ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विभज्य काले कालज्ञः सर्वान्सेवेत पण्डितः ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
विभज्य चाप्यनीकानि यथा वा मन्यसेऽनघ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
विभज्य दण्डं रक्ष्याः स्युर्धर्मतो न यदृच्छय़ा ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
विभज्य दण्डः कर्तव्यो धर्मेण न यदृच्छय़ा |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
विभज्य व्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
विभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः ||
५१ ख