उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
न स्थातुमन्तरिक्षे च शेकुराकाशगास्तदा ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रिय़कारिणः ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
न स्थेय़ं विषय़े तेषु योऽपकुर्याद्द्विजातिषु ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
न स्नातकव्रता विप्रा वहिर्माल्यानुलेपनाः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
न स्नेहस्य विरोधोऽस्ति विलापरुदितस्य वै |
६१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक्च तानधिगच्छति ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान्नरान्देवं महेश्वरम् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
न स्फुटेद्धृदय़ं कस्य ऐश्वर्याद्भ्रंशितस्य च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म कश्चिद्गृहे राजंस्तदासीद्भरतर्षभ |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
न स्म किञ्चिदभाषन्त मनसा समपूजय़न् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म क्लेशतमं मे स्यात्पुत्रैः सह परन्तप |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म त्रय़ोदश समाः पार्था दुःखमवाप्नुय़ुः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
न स्म निद्रां लभे रात्रौ न चाहनि सुखं क्वचित् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
न स्म पश्यामहे कञ्चिद्यः प्राणान्परिरक्षति |
८६ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म प्रज्ञाय़ते किञ्चिदम्भसा समवस्तृते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म प्रज्ञाय़ते किञ्चिदावृते व्योम्नि रेणुना |
८ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म प्रज्ञाय़ते किञ्चिद्व्रह्मशव्देन भारत ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न स्म विव्यथते राजन्कृष्णतुल्यपराक्रमः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
न स्म शस्त्रं ग्रहीतव्यमन्यत्र क्षत्रवन्धुतः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
न स्म स प्रापतद्वह्नौ तक्षको भय़पीडितः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
न स्म सम्पतते कश्चिदन्तरिक्षचरस्तदा ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
न स्म सम्पतते भूमौ दृष्ट्वा द्रौणेः पराक्रमम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
न स्म सूर्यस्तदा भाति न च वाति समीरणः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
न स्म हे मूढविज्ञाना न स्म हे मन्दवुद्धय़ः |
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
अर्जुन उवाच
न स्मरन्त्यपराद्धानि स्मरन्ति सुकृतानि च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
न स्मरामि प्रतिश्रुत्य किञ्चिदप्यनपाकृतम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
दमय़न्त्यु उवाच
न स्मराम्यनृतं किञ्चिन्न स्मराम्यनुपाकृतम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
न स्मराम्यनृतां वाचं न स्मरामि पराजय़म् |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
न स्मराम्यात्मनः किञ्चित्पुरा सञ्जय़ दुष्कृतम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
न स्मराम्युक्तपूर्वां वै स्वैरेष्वप्यनृतां गिरम् |
९७ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
न स्मरेय़ं कदा वैरं कृतं युष्माभिरित्युत |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न स्माशक्यत वीभत्सुः केनचित्प्रसमीक्षितुम् ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न स्मोपय़ान्ति निद्रां वै अतदर्हा जनार्दन ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
न स्यात्फलं तस्य कुतः प्रसिद्धि; रन्यत्र दैवादिति चिन्तय़ामि ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
न स्यात्सन्धिर्मनुष्याणां क्रोधमूलो हि विग्रहः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
न स्यादन्धश्च वृद्धश्च भर्तव्योऽय़मिति स्म ते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
न स्याद्यदीह दण्डो वै प्रमथेय़ुः परस्परम् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न स्याद्वनमृते व्याघ्रान्व्याघ्रा न स्युरृते वनम् |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
न स्वप्नेन जय़ेन्निद्रां न कामेन स्त्रिय़ं जय़ेत् |
६६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न स्वल्पमपि पुत्रस्ते व्यलीकं कृतवान्नृप |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
न स्वाध्याय़ैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन |
१०२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं; नान्यस्य दुःखे भवति प्रतीतः |
९४ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
न स्वय़ं तत्र गमनं रोचय़े तव भारत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न स्वय़ं हन्मि विप्रर्षे विक्रीणामि सदा त्वहम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
न हतो जामदग्न्येन दिव्यैरस्त्रैः स्म यः पुरा ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
न हतो जामदग्न्येन स हतोऽद्य शिखण्डिना ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
न हनिष्यन्ति गङ्गेय़ं पाण्डवा घृणय़ेति च ||
७ ख