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शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि कृत्स्नतमो धर्मः शक्यः प्राप्तुमिति श्रुतिः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन |
५६ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
न हि केवलमस्माकं यावन्तोऽन्ये च पार्थिवाः |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
न हि केवलमस्माकमय़मर्च्यतमोऽच्युतः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा; शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
न हि क्रुद्धो रणे राजा क्षपय़ेत वलं मम ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
न हि खल्वनुपाय़ेन कश्चिदर्थोऽभिसिध्यति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
न हि गतिरधिकास्ति कस्य चि; त्सति हि गुणे प्रवदन्त्यतुल्यताम् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
न हि गतिरधिकास्ति कस्य चि; द्भवति हि या विदुषः सनातनी ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
न हि गाण्डीवनिर्मुक्ता गार्ध्रपत्राः सुतेजनाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम् |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीय़ते ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
न हि गुह्यमतः श्रोतुमिच्छामि द्विजपुङ्गवाः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि जातु द्वय़ोर्वुद्धिः समा भवति कर्हिचित् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
न हि जातो न जाय़ेऽहं न जनिष्ये कदाचन |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अम्वो उवाच
न हि जानाति मे भीष्मो व्रह्मञ्शाल्वगतं मनः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
न हि जानामि वृत्तान्तं धर्मराजस्य केशव |
२७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
न हि जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १३३
द्वारपाल उवाच
न हि ज्ञानमल्पकालेन शक्यं; कस्माद्वालो वृद्ध इवावभाषसे ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
न हि ज्ञानविरुद्धेषु वहुदोषेषु कर्मसु |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न हि ज्यां स्पृशमानस्य तलत्रे चापि गृह्णतः |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि तं तत्त्वतो राजन्वेद कश्चिद्धनञ्जय़म् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
न हि तं दृष्टवान्कश्चित्पद्मय़ोनिरपि स्वय़म् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
न हि तं वारय़ामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
न हि तं वेद पार्थोऽपि भ्रातरं श्वेतवाहनः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
न हि तत्कुरुते सङ्ख्ये कार्तवीर्यसमस्त्वपि |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
न हि तत्तस्य वीरस्य हृदय़ादपसर्पति |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
न हि तत्परमं किञ्चिदिह लोके परत्र च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
न हि तत्प्रीणय़ेल्लोकान्न कोशं तद्विधं नृपः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
युधिष्ठिर उवाच
न हि तत्र धनं स्फीतं न च सम्वन्धिवान्धवाः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
न हि तस्य महावाहोः शक्रप्रतिमतेजसः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
न हि तस्यान्यथा पीडा शक्या कर्तुं तथाविधा |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि तस्याप्रिय़ं कुर्यां प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
न हि तां वेद नगरे कश्चिदन्यत्र पार्षतात् ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि तां वेद नार्यन्या काचिद्धात्रेय़िकामृते |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि तानश्रुपातान्वै शक्ता धारय़ितुं मही ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि तामुत्सहे वक्तुं स्वय़ं गन्धर्वरक्षिताम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
न हि तावद्रणे पार्थं वाणखड्गधनुर्धरम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
न हि तृप्तास्मि कामानां तज्ज्येष्ठा अनुमन्यताम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
युधिष्ठिर उवाच
न हि तृप्तोऽस्मि भगवञ्शृण्वानो धर्ममुत्तमम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
जनमेजय़ उवाच
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
जनमेजय़ उवाच
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
धृतराष्ट्र उवाच
न हि तृप्यामि वीराणां शृण्वानो विक्रमान्रणे ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
युधिष्ठिर उवाच
न हि तृप्याम्यहं वीर शृण्वानोऽमृतमीदृशम् ||
२ ख