आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
क्षुधार्तः प्रत्युवाचेदं पुनरेव महामुनिः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
क्षुधार्तश्चाहमगतिर्निराशः; श्वमांसे चास्मिन्षड्रसान्साधु मन्ये ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
ऋषय़ ऊचुः
क्षुधार्ताः सुपरिश्रान्ताः शपथाय़ोपचक्रमुः ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
क्षुधितः क्षुद्विघातार्थं सिंहो मृगगणानिव ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिमन्तिके ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
क्षुधितो मामसूय़ेथाः श्रमाद्वेति नराधिप |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
क्षुधितोऽहं गतप्राणो हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम् |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
क्षुपस्तु मनवे प्रादादादित्यतनय़ाय़ च |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
क्षुपस्य पुत्रस्त्विक्ष्वाकुर्महीपालोऽभवत्प्रभुः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुपाज्जग्राह चेक्ष्वाकुरिक्ष्वाकोश्च पुरूरवाः |
७२ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुभिताः सरितश्चैव तथैव च महोदधिः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
क्षुभ्यमाणे वले तूर्णं सागरप्रतिमे तव |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
क्षुरधारा विषं सर्पो मृत्युरित्येकतः स्त्रिय़ः ||
४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रिय़ः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रकृत्तौ सुभृशं सतोमरौ; च्युताङ्गदौ चन्दनरूषितौ भुजौ |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रणुन्नं तत्तस्य शिरश्चन्द्रनिभाननम् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्राभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यां सान्वकीर्यत भूतले ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण च तीक्ष्णेन कौरव्यस्य महद्धनुः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण च तीक्ष्णेन चिच्छेदास्य महद्धनुः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण च पीतेन मुष्टिदेशे महद्धनुः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा कर्णं विव्याध पत्रिणा ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ताडय़ामास कर्णिना ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा दशभिः प्रत्यविध्यत ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण धनुस्तस्य चिच्छेद कृतहस्तवत् |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण प्रमथ्याशु पातय़ामास भूतले ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण शिरः काय़ात्पातय़ामास पाण्डवः ||
२७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण शिरो राजन्निचकर्त महामनाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण समुन्मथ्य ननाद विसृजञ्शरान् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन अनुविन्दशिरोऽहरत् ||
२० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कर्णस्य धनुरच्छिनत् ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कार्मुकं चिच्छिदे वली ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन खड्गं चिच्छेद सुप्रभम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेद कृतहस्तवत् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन पार्थकेतुमताडय़त् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन प्रहसन्निव भारत ||
३९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन राजा चिच्छेद संय़ुगे ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतः प्रापतद्भुवि ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतद्भुवि |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन सोऽभवद्गतजीवितः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रैः पातय़ामास तावकानां स माधवः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च नाराचैः सशिलीमुखैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
क्षुरप्रैर्वत्सदन्तैश्च विपाठैश्च महाय़शाः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्तैस्तथाय़सैः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
क्षुराः क्षुरप्रनालीका वत्सदन्तास्त्रिसन्धिनः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
क्षुरान्तं वालसूर्याभं मणिरत्नविभूषितम् |
४३ क