भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
न हि पश्यामि तं वीरं यो मे रक्षेत्सुतान्रणे |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
न हि पश्यामि सङ्ग्रामे कदाचिदपि कौरव |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
न हि पश्याम्यहं तं वै त्रिषु लोकेषु सञ्जय़ |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
न हि पश्याम्यहं तात यस्तिष्ठेत रणाजिरे ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न हि पाञ्चालराजस्य लोके कश्चन विद्यते |
८६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
न हि पाण्डुसुता राजन्ससैन्याः सपदानुगाः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिव ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि पापं कृतं किञ्चित्कर्म वा निन्दितं क्वचित् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि पापमपापात्मा रोचय़िष्यति पाण्डवः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
न हि पापात्पापतरमस्ति किञ्चिदराजकात् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
न हि पापीय़सः श्रेय़ान्भूत्वा प्रेष्यत्वमुत्सहे ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
न हि पारं प्रपश्यामि दुःखस्यास्य कथञ्चन |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
न हि पार्थाः सपाञ्चालाः स्थातुं शक्तास्तवाग्रतः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
न हि पार्थो रणे शक्यः सेन्द्रैर्देवासुरैरपि |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
न हि पुण्यतमं किञ्चिद्गोभ्यो भरतसत्तम |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
न हि पुत्रा महाराज जीवेय़ुस्ते कथञ्चन ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
अश्वत्थामो उवाच
न हि पुत्रेण हैडिम्वे पिता न्याय़्यं प्रवाधितुम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम् |
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
अर्जुन उवाच
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या; द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रिय़ाणाम् |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि प्रमत्तेन नरेण लभ्या; विद्या तपः श्रीर्विपुलं यशो वा |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि प्रमादात्परमोऽस्ति कश्चि; द्वधो नराणामिह जीवलोके |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
न हि प्रशास्तुं राज्यं हि शक्यमेकेन भारत |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
न हि प्रहर्तुमिच्छन्ति शूराः प्राद्रवतां भय़ात् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न हि प्राणात्प्रिय़तरं लोके किञ्चन विद्यते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
न हि भीमभय़ाद्भीता लप्स्यन्ते विजय़ं विभो |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
श्रीकृष्ण उवाच
न हि भीष्मं दुराधर्षं व्यात्ताननमिवान्तकम् |
९३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
न हि भीष्मं महेष्वासं पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि भीष्मकृपद्रोणाः सगणा मधुसूदन |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
न हि भीष्मशरानन्यः सोढुमुत्सहते विभो ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
न हि भीष्मस्त्वय़ा वीर युध्यमानो निपातितः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
न हि भूमिप्रदानेन दानमन्यद्विशिष्यते ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
न हि मद्राधिपादन्यः सर्वराजसु भारत |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
न हि मद्राधिपादन्यो रामाद्वा यदुनन्दनात् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
न हि मद्रेश्वरो राजा कुर्याद्यदनृतं भवेत् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मद्वाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
न हि मद्वाहुगुप्तस्य प्रभवन्त्यमरा अपि |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
न हि मद्वीर्यमासाद्य फल्गुनः प्रसहिष्यति |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
नाग उवाच
न हि मां केवलं दृष्ट्वा त्यक्त्वा प्रणय़वानिह |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न हि मां क्षत्रिय़ः कश्चिद्वीर्येण विजय़ेद्युधि |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
न हि मां समरे सोढुं स शक्तोऽग्निं तरुर्यथा |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
न हि मांसं तृणात्काष्ठादुपलाद्वापि जाय़ते |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
न हि मानं प्रशंसन्ति निकृतौ कितवस्य ह |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
पितामह उवाच
न हि मानप्रदग्धानां कश्चिदस्ति समः क्वचित् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
न हि मानुषरूपोऽसि को वार्थः काङ्क्षितस्त्वय़ा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
व्यास उवाच
न हि मामव्रतोपेता उपेय़ात्काचिदङ्गना ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
कर्ण उवाच
न हि मामाहवे क्रुद्धमन्यः साक्षाच्छचीपतेः |
१८ क