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उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
सोऽहं यतिष्ये प्रशमं क्षत्तः कर्तुममाय़या |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ८७
यय़ातिरु उवाच
सोऽहं यदैवाकृतपूर्वं चरेय़ं; विवित्समानः किमु तत्र साधु ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं युधिष्ठिरं हत्वा सत्येऽप्यानृण्यतां गतः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सोऽहं योगगतिर्व्रह्मन्योगशास्त्रेषु शव्दितः ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
सोऽहं योगवलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं योत्स्यामि तत्त्वेन पालय़ंस्तव वाहिनीम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
सोऽहं रुधिरसिक्ताङ्गं राज्ञां मध्ये पितामहम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं वनं गमिष्यामि निर्वन्धुर्ज्ञातिसङ्क्षय़े ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
प्रह्राद उवाच
सोऽहं वागग्रपिष्टानां रसानामवलेहिता |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
शम्वर उवाच
सोऽहं वागग्रसृष्टानां रसानामवलेहकः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय १
मय़ उवाच
सोऽहं वै त्वत्कृते किञ्चित्कर्तुमिच्छामि पाण्डव ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
सोऽहं शरीरजे दत्त्वा कीर्तिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं शापादगस्त्यस्य व्राह्मणानवमन्य च |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १०
डुण्डुभ उवाच
सोऽहं शापेन विप्रस्य भुजगत्वमुपागतः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
सोऽहं श्रिय़ं च तां दृष्ट्वा सभां तां च तथाविधाम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं श्वस्तत्करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं संशय़मापन्नः प्रकरिष्ये कथं रणम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं सम्भावनां चैतामाचार्यवचनं च तत् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
सोऽहं सर्वविनाशं तं चिन्तय़ानो मुहुर्मुहुः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
युधिष्ठिर उवाच
सोऽहं हताशो दुर्वुद्धिः कृतस्तेन दुरात्मना |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
सोऽहं ह्यहिंस्रः सत्यार्थी कामक्रोधवहिष्कृतः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहङ्कार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमय़ो हि सः ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
सोऽहमद्य गमिष्यामि यत्र ते पुरुषर्षभाः |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमद्य महादेवं प्रपद्ये शरणं प्रभुम् |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमद्य यथाकामं क्षत्रधर्ममुपास्य तम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमद्य युधा जेतुमाशंसे मद्रकेश्वरम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमद्य रणे यत्तः सहितौ कृष्णपाण्डवौ |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
सोऽहमनुज्ञातो भवता इच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहर्तुमिति ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
सोऽहमन्तावसानानां हरमाणः परिग्रहात् |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहमप्यद्य यास्यामि गतिं पितृनिषेविताम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहमभ्यागतः क्षिप्रं दिदृक्षुस्त्वां सहानुजम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
सोऽहमागस्करः पापः पृथिवीनाशकारकः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
सोऽहमात्मा स्वय़ं पित्रा पुत्रत्वे प्रकृतः पुनः |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
सोऽहमात्मोपहारेण यक्ष्ये त्रिपुरघातिनम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहमिच्छामि तत्सर्वं विधिवद्देवकीसुत |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
मरुत्त उवाच
सोऽहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमिच्छाम्यनुज्ञातुं रक्षितुं वा महात्मना |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
सोऽहमिन्द्रस्य वचनान्निय़ोगादर्जुनस्य च |
८ क
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
सोऽहमिन्द्राय़ दास्यामि कुण्डले सह वर्मणा |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहमीशानमनघमस्तौषं शरणं गतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५२
व्राह्मण उवाच
सोऽहमुञ्छव्रतं साधो चरिष्याम्यर्थदर्शनम् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमुत्क्रम्य पन्थानं शास्त्रदृष्टं सनातनम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
सोऽहमेकमपत्यं वै जनय़िष्यामि गालव |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
सोऽहमेकरथेनैव गतः काशिपतेः पुरीम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहमेको वहून्वालः कृतास्त्रानकृतश्रमः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
सोऽहमेतां गतिं प्राप्तो यथा नकुशलं तथा |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमेतादृशं कृत्वा जगतोऽस्य पराभवम् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
सोऽहमेतादृशाँल्लोकान्दृष्ट्वा भरतसत्तम |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमेतादृशो भूत्वा नेहारिकुलमर्दन |
३८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनः सदा |
८ क