शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
कुलशोकाकरं मूढाः पुत्रं त्यक्त्वा क्व यास्यथ ||
८५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
कुलसंहननज्ञानैर्वलविक्रमवुद्धिभिः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
कुलसङ्ख्यां तु गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
कुलसङ्ख्यां न गच्छन्ति यानि हीनानि वृत्ततः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
कुलसत्त्ववलोपेता वाजिनो वारणोपमाः ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
कुलसर्वस्वभूतं वै रुदन्तः शोकविह्वलाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
कुलस्य मम सन्तानं लोकस्य च कुरु प्रिय़म् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
कुलस्य ये वः प्रस्थितास्तत्साधुत्वमनुत्तमम् ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कुलस्य सदृशस्तूर्णं प्रतोदो गृह्यतां त्वय़ा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कुलस्य सन्ततिं चैव यथान्याय़ं यथाक्रमम् ||
२१० ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
कुलस्य सन्तानकरं च यद्भवे; त्तृतीय़मेतं वरय़ामि ते वरम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं; शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
कुलस्यास्य विनाशाय़ तथैव च महीक्षिताम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
कुलस्यास्य हितार्थं त्वं कुरु कल्याणमुत्तमम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
कुलस्यास्यान्तकरणं दुर्मतिं पापकारिणम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
कुलस्रोतसि सञ्छन्ने यस्य स्याद्योनिसङ्करः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
कुलाज्ज्ञानात्तथैश्वर्यान्मदो भवति देहिनाम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
कुलात्तु तव धर्मात्मन्कन्यां सोऽधिगमिष्यति |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
कुलाधिवासनामानि श्रावय़न्तोऽर्जुनात्मजम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
व्रह्मो उवाच
कुलानां पावनं प्राहुर्जातरूपं शतक्रतो |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
कुलानि समुपेतानि गोभिः पुरुषतोऽश्वतः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
कुलानुजीवं वीर्यवन्तं वृहन्तं; भुङ्क्ते लोकान्संमितान्धेनुदस्य ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
कुलानुरूपं कुर्वाणं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
कुलान्तकरणे पापे जातमात्रे सुय़ोधने ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
कुलान्तकरणो व्यक्तं जात एष जनार्दन |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
कुलान्यकुलतां यान्ति धर्मस्यातिक्रमेण च ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
कुलान्यकुलतां यान्ति न्यासापहरणेन च ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
कुलान्यकुलतां यान्ति व्राह्मणातिक्रमेण च ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
कुलान्यल्पावशिष्टानि कृतवन्तो वनौकसाम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
कुलालचक्रवद्भ्रान्तं पाण्ड्येनाधिष्ठितं वलम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
कुलिङ्गशकुनौ राजन्नीडं शिरसि चक्रतुः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कुलिन्दाः कुलकाश्चैव करण्ठाः कुरकास्तथा ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
कुलीनं शिक्षितं प्राज्ञं ज्ञानविज्ञानकोविदम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
कुलीनः कर्मकृद्वैद्यस्तथा चाप्यानृशंस्यवान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
कुलीनः पूजितो नित्यं न हि शक्तिं निगूहति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
कुलीनः शीलसम्पन्नः स ते स्यात्प्रत्यनन्तरः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
कुलीनः शीलसम्पन्नस्तितिक्षुरनसूय़कः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
कुलीनः शीलसम्पन्नो वाग्मी दक्षः प्रिय़ंवदः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
कुलीनः सत्यसम्पन्नः शक्तोऽमात्यः प्रशंसितः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
कुलीनः सत्यसम्पन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
कुलीनत्वेन रमते दुष्कुलीनान्विकुत्सय़न् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिस्तव ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
कुलीनस्य च या निन्दा वधश्चामित्रकर्शन |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
कुलीना देशजाः प्राज्ञा रूपवन्तो वहुश्रुताः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च योषितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च सर्वशः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
कुलीना वाक्यसम्पन्ना ज्ञानविज्ञानकोविदाः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
कुलीना शीलसम्पन्ना प्राणेभ्योऽपि गरीय़सी |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
कुलीना शीलसम्पन्ना सर्वैः समुदिता गुणैः ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
कुलीना हय़योनिज्ञाः सारथ्ये विनिवेशिताः |
९ क