शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
न हि शक्यमदण्डेन क्लीवेनावुद्धिनापि वा ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
न हि शक्यमनाख्यातुमेवं पृष्टेन पार्थिव ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न हि शक्या गुणा वक्तुमिह वर्षशतैरपि ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
न हि शक्या रणे जेतुं सात्वता मनुजर्षभ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वय़ा ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि शक्यास्तथाभूता यत्नादपि नराधिप ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
न हि शक्योऽर्जुनो जेतुं सेन्द्रैः सर्वैः सुरासुरैः ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि शक्ष्यन्ति राजानं युधिष्ठिरमुदीक्षितुम् ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि शक्ष्यामि कौरव्यान्नश्यमानानुपेक्षितुम् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
न हि शक्ष्यामि दुःखानि सोढुं कष्टानि सञ्जय़ ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
न हि शक्ष्याम्यनिर्जित्य गाः प्रय़ातुं पुरं प्रति ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
न हि शक्ष्याम्यहं त्यक्तुं नृपं दुर्योधनं रणे |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि शान्तिं प्रपश्यामि घातय़ित्वा पितामहम् |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न हि शुध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
न हि शुल्कपराः सन्तः कन्यां ददति कर्हिचित् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
न हि शुश्रुम वातेन मेरुमुन्मथितं गिरिम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
न हि शुश्रुम संमर्दे क्रोष्ट्रा सिंहौ निपातितौ ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
न हि शूराः पलाय़न्ते शत्रून्दृष्ट्वा कथञ्चन |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
न हि शैनेय़ दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
न हि शौर्यात्परं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
न हि श्रुतवतां किञ्चिदधिकं व्राह्मणादृते ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
न हि श्रोतास्मि भीष्मस्य धर्मय़ुक्तं प्रभाषितम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
न हि स ज्ञाय़ते वीरो नलो जीवन्मृतोऽपि वा ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि सञ्चय़वान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
न हि सत्त्वात्परो भावः कश्चिदन्यो विधीय़ते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न हि सत्यादृते किञ्चिद्राज्ञां वै सिद्धिकारणम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
न हि सन्तप्यते तेन तथारूपेण कर्मणा ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
धृतराष्ट्र उवाच
न हि सन्तर्जना तेन श्रुतपूर्वा कदाचन |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
न हि सन्तापकालोऽय़ं वैद्यस्य तव विद्यते ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि सम्वुध्यते तावत्सुप्तः सिंह इवाच्युतः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
न हि सर्वहितः कश्चिदाचारः सम्प्रदृश्यते ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
न हि सर्वे मय़ा शक्या वक्तुं भगवतो गुणाः ||
७० ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
न हि सस्मार नृपतिस्तं शापं शापमोहितः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
न हि सा क्षत्रिय़ा उच्छिष्टेनाशुचिना वा शक्या द्रष्टुम् |
११२ घ
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
न हि सा तेन सम्भेदं पत्नी नीता महात्मना |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
न हि साम्ना न दानेन न भेदेन च पाण्डवाः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि साम्ना न दानेन शक्योऽर्थस्तेषु कश्चन |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
न हि सोऽस्ति पुमाँल्लोके यः सङ्क्रुद्धं वृकोदरम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
न हि स्त्रीभ्य परं पुत्र पापीय़ः किञ्चिदस्ति वै |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि स्म किञ्चिदप्राप्यं भवेदपि दिवि स्थितम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
न हि स्वचित्ततां लेभे कश्चिदाहतलक्षणः ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
न हि स्वमस्ति शूद्रस्य भर्तृहार्यधनो ह्यसौ ||
३५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
न हि स्वेषां परेषां वा विशेषः प्रत्यदृश्यत ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
न हिंसन्ति स्थावरं जङ्गमं च; भूतानां ये सर्वभूतात्मभूताः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
जनक उवाच
न हिंसन्तीह भूतानि क्रिय़माणानि सर्वदा ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
न हिंस्या मानुषा भूय़ो युष्माभिरिह कर्हिचित् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
न हिंस्यात्परवित्तानि देय़ं काले च दापय़ेत् |
१२ क