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शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्राय़णगतश्चरेत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्राय़णगतश्चरेत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्राय़णगतिश्चरेत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
न हिंसय़ति यः प्राणान्मनोवाक्काय़हेतुभिः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
न हिनस्ति ह्यारभते नाभिद्रुह्यति किञ्चन |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
न हिरण्यैर्न वासोभिर्नाश्वदानेन भारत |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
न हीदं कर्म मोघं स्याल्लोककामस्य नः पितुः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान्क्वचित् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
न हीदानीं सहाय़ा मे परीप्सन्त्यनुपस्कृताः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
न हीदानीमुपाय़ोऽन्यो विद्यते प्राणधारणे ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
न हीदृशं प्रिय़ं मन्ये भविता धर्मवत्सल ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ८२
यय़ातिरु उवाच
न हीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न हीदृशमनाय़ुष्यं लोके किञ्चन विद्यते |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न हीदृशा गमिष्यन्ति नरकं पाण्डवर्षभ |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
न हीदृशाः क्लीवरूपा भवन्तीह नरोत्तमाः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
न हीदृशाः सन्त्यपरे पृथिव्यां; ये योधका धार्तराष्ट्रेण लव्धाः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
न हीमां पवनो राजन्न नागा न नगा महीम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
वलिरु उवाच
न हीमामासुरीं वेद्मि न दैवीं न च मानुषीम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
न हीमे सर्वराजानः पर्याप्ताः सहितास्त्वय़ा |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
अर्जुन उवाच
न हीह दुर्योधनता तवास्ति; पलाय़मानस्य रणं विहाय़ ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
न हीय़ं स्ववशा वाला कामय़त्यद्य मामिह |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २२२
शार्ङ्गका ऊचुः
न हृतं तं वय़ं विद्मः श्येनेनाखुं कथञ्चन |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
न हृदय़मनुरुध्यते मनो वा; प्रिय़सुखदुर्लभतामनित्यतां च |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
भीष्म उवाच
न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
न हृष्यत्यर्थलाभेषु नालाभेषु व्यथत्यपि |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
न हृष्यत्यात्मसंमाने नावमानेन तप्यते |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
न हेतुवादाद्धर्मात्मा सत्यं जह्यात्कथञ्चन ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
न हेतुवादाल्लोभाद्वा धर्मं जह्यां कथञ्चन ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
न होममन्त्रा न च मङ्गलानि; नाथर्वणा नाप्यगदाः सुसिद्धाः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
न ह्यकामेन संवादं मनुरेवं प्रशंसति |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
न ह्यज्ञातमसाध्यं वा तस्य सङ्ख्येऽस्ति किञ्चन |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
न ह्यतः सदृशं किञ्चिद्धनमस्ति युधिष्ठिर ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५५
भीष्म उवाच
न ह्यतप्ततपा मूढः क्रिय़ाफलमवाप्यते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यतुष्टो जनोऽस्तीह पुरे चान्तःपुरे च ते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
न ह्यतो दुष्करं कर्म किञ्चिदस्ति सुरोत्तम |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ७४
देवय़ान्यु उवाच
न ह्यतो दुष्करतरं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
न ह्यत्यन्तं धनवन्तो भवन्ति सुखिनोऽपि वा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
न ह्यत्यन्तं वलय़ुता भवन्ति सुखिनोऽपि वा |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेऽग्र्यकर्मणः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
न ह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात्पश्यन्ति पादपाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
न ह्यदैवकृतं किञ्चिन्नराणामिह विद्यते ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
न ह्यधर्मतय़ा धर्मं दद्यात्कालः कथञ्चन |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
व्यास उवाच
न ह्यधर्मेण राजर्षिः पाण्डवो जेतुमिच्छति ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
न ह्यनीकमनीकेन समसज्जत सङ्कुले |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
न ह्यन्तरमभूत्किञ्चित्क्वचिज्जन्तुभिरच्युत |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
न ह्यन्नं नोदकं तस्य न स्नानं नाप्यशौचकम् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्यन्यं परिपश्यामि वधे कञ्चन शुष्मिणः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
न ह्यन्यः समरे रात्रौ शक्तः कर्णं प्रवाधितुम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
न ह्यन्यत्तीरमासाद्य पुनस्तर्तुं व्यवस्यति |
३० क