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कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्यन्यदनुपश्यामि कारणं तस्य नाशने ||
७५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
न ह्यन्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाग्जय़ः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
न ह्यन्यमनुपश्यामि कञ्चिद्यौधिष्ठिरे वले ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
यय़ातिरु उवाच
न ह्यन्यमहमर्हामि प्रष्टुं लोकपितामह ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
अर्जुन उवाच
न ह्यन्यो वर्तय़ेन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
न ह्यपश्यं कञ्चिदहं पृथिव्यां; श्रुतं समं वाधिकमर्जुनेन |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा विनश्यति ||
१९७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
न ह्यभक्ताय़ राजेन्द्र भक्ताय़ानृजवे न च |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
न ह्यभून्मैथुनो धर्मस्तेषामपि जनाधिप ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
न ह्यमित्रवशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे |
१८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
न ह्ययं कस्यचित्कश्चिन्नास्य कश्चन विद्यते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
न ह्ययं चक्षुषा दृश्यो न च सर्वैरपीन्द्रिय़ैः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
न ह्ययं भवतः स्वल्पो व्यभिचारो भविष्यति ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
न ह्ययं वालहा पापश्चिरं जीवितुमर्हति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
न ह्ययज्ञा अमुं लोकं प्राप्नुवन्ति कथञ्चन ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्ययुक्तं न चासत्यं नानृतं न च विप्रिय़म् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
न ह्यरण्येषु पश्यामि धनवृद्धानहं क्वचित् ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यर्जुनं महावाहुं नापि कृष्णं महावलम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यर्जुनसमः कश्चिद्युधि योद्धा धनुर्धरः |
६० क
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
न ह्यर्हति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यर्हत्येष सत्कारं नापि वृद्धक्रमं गुणैः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
न ह्यलं त्वद्विसृष्टानां शराणां ते सकेशवाः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
न ह्यल्पं दुष्कृतं नोऽस्ति येनाग्निर्नाशमागतः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान्कुरुते मुनीन् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यवश्येन्द्रिय़ो राज्यमश्नीय़ाद्दीर्घमन्तरम् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
न ह्यवस्थाप्यते पार्थो युय़ुत्सुः केनचित्सह |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
न ह्यविज्ञाय़ शात्रार्थं प्रवर्तन्ते प्रवृत्तय़ः ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते तव किञ्चन |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते मम मानद |
३० क
सभा पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यसौ सुमहावुद्धिरहितं नो वदिष्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
न ह्यस्ति सर्वभूतेषु दुःखमस्मिन्कुतः सुखम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
न ह्यस्त्यविदितं लोके देवर्षे तव किञ्चन |
९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
न ह्यस्मान्कर्णसहिताञ्जय़ेच्छक्रोऽपि संय़ुगे ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
जनमेजय़ उवाच
न ह्यस्मिञ्शीलहीनो वा निर्वीर्यो वा नराधिपः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
नरनाराय़णावू ऊचतुः
न ह्यस्मिन्नाश्रमे युद्धं कुतः शस्त्रं कुतोऽनृजुः |
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
भीमसेन उवाच
न ह्यस्य कञ्चिदिच्छामि सहाय़ं वरवर्णिनि ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
युधिष्ठिर उवाच
न ह्यस्य जननीं विद्म जन्म चाग्र्यं महात्मनः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यस्य त्रिषु लोकेषु सदृशोऽस्ति धनुर्धरः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
न ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षय़े |
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
न ह्यस्य नृपते किञ्चिदनिष्टमुपलक्षय़े |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
सञ्जय़ उवाच
न ह्यस्य विद्यते त्राता साक्षादपि पुरन्दरः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यस्य वीर्येण वलेन कश्चि; त्समः पृथिव्यां भविता नरेषु |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
इन्द्र उवाच
न ह्यस्य सदृशं किञ्चित्प्रतिघाताय़ यद्भवेत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
न ह्यस्य सदृशः कश्चिदुभय़ोः सेनय़ोरपि ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्यस्य समरे मुच्येतान्तकोऽप्यातताय़िनः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
न ह्यस्य समरे मुच्येदन्तकोऽप्यातताय़िनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
न ह्यहं कामय़े नित्यमविक्रान्तेन रक्षणम् ||
७७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यहं तत्र यास्म्यामि स्थितोऽस्मीति निवेद्यताम् |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
न ह्यहं त्वदृते भीरु शक्ष्ये जीवितुमात्मना |
११ क