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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
न ह्यहं त्वा महाराज अनिक्षिप्य महाहवे |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
न ह्यहं त्वां विजानामि मधुदिग्धमिव क्षुरम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्यहं द्यूतमिच्छामि विदुरो न प्रशंसति |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
न ह्यहं न च मे भर्ता नेति व्राह्मणमुक्तवान् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
न ह्यहं नाद्य विक्रम्य स्थविरोऽपि शिशोस्तव |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्यहं पाण्डवेय़स्य विषय़े वस्तुमुत्सहे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
न ह्यहं प्रतिय़ास्यामि पुरं शत्रुनिराकृतः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेय़ं त्वदृते नरम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्यहं युद्धमिच्छामि नैतदिच्छति वाह्लिकः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यहं श्लाघनो राजन्भूतपूर्वः कदाचन |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
न ह्यहं हातुमिच्छामि भवन्तमिह कर्हिचित् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
न ह्यहत्वा रणे शत्रुं वाह्लीकं कौरवाधमम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
न ह्यहमुपाध्याय़ेन सन्दिष्टः |
९० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३०७
भीष्म उवाच
न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः समाः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
न ह्यात्मनः प्रिय़तरः कश्चिदस्तीति निश्चितम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
न ह्यात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति भारत ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
गरुड उवाच
न ह्यात्मस्तवसंय़ुक्तं वक्तव्यमनिमित्ततः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
न ह्यात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रिय़ैः कामगोचरैः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
न ह्यात्मा शक्यते हन्तुं दृष्टान्तोपगतो ह्यसौ ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
न ह्याददानं ददृशुः सन्दधानं च साय़कान् |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
न ह्युत्थानमृते दैवं राज्ञामर्थप्रसिद्धय़े ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
अम्वो उवाच
न ह्युत्सहे स्वनगरं प्रतिय़ातुं तपोधन |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
न ह्युपाय़ेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुनन्दन ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
न ह्येकचक्रं वर्तेत इत्येवमृषय़ो विदुः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८८
द्रुपद उवाच
न ह्येका विद्यते पत्नी वहूनां द्विजसत्तम ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
न ह्येकाह्ना शतं गन्ता त्वदृतेऽन्यः पुमानिह ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
न ह्येको भृत्यरहितो राजा भवति रक्षिता |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
दुर्योधन उवाच
न ह्येको वहुभिर्न्याय़्यो वीर योधय़ितुं युधि ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
न ह्येको वहुभिर्वीरैर्न्याय़्यं योधय़ितुं युधि ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
न ह्येतच्छ्रोतुमर्होऽन्यो मनुष्यस्त्वामृतेऽनघ |
५३ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
न ह्येतत्संय़ुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वरः ||
५३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
न ह्येतदनृतं कर्तुमर्हः पार्थो धनञ्जय़ः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
न ह्येतद्व्रह्मणा प्राप्तमीदृशं मम दर्शनम् |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
न ह्येतामाशिषं पाण्डुर्न च कुन्त्यन्वय़ाचत |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
न ह्येतामाशिषं पाण्डुर्न चाहं न पितामहः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
न ह्येतावद्भवेद्गम्यं न यस्मात्प्रकृतेः परः ||
५० ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्येनं त्वं तथा वेत्थ यथैनं वेद कौरवः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्येनमभिसङ्क्रुद्धमेको युध्येत संय़ुगे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
न ह्येनमैच्छत्प्रमुखे सौतेः स्थापय़ितुं रणे ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
वासुकिरु उवाच
न ह्येनां सोऽव्ययो देवः शपन्तीं प्रत्यषेधय़त् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५६
सञ्जय़ उवाच
न ह्येव कर्ता पुरुषः कर्मणोः शुभपापय़ोः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
न ह्येव ते वचनं वासुदेवो; धनञ्जय़ो वा जातु किञ्चिन्न कुर्यात् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
न ह्येव दुःखानि सदा भवन्ति; सुखस्य वा नित्यशो लाभ एव ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
न ह्येव नः पृच्छसि ये वय़ं स्म; न चापि जानीम तवेह नाथम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
न ह्येव पुरुषो द्रष्टा स्वर्गस्य नरकस्य वा |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
न ह्येव भार्या क्रेतव्या न विक्रेय़ा कथञ्चन ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
न ह्येव व्रह्मचर्येण न वेदाध्ययनेन च |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवः |
९६ क