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वन पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्येवं शीलसम्पन्ना नैवं पूजितलक्षणाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १२०
वासुदेव उवाच
न ह्येष कामान्न भय़ान्न लोभा; द्युधिष्ठिरो जातु जह्यात्स्वधर्मम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
न ह्येष क्षय़माप्नोति सोमः सुरगणैर्यथा |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
न ह्येष तर्कय़ा शक्यो वक्तुं वर्षशतैरपि ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
न ह्येष मृगय़ाधर्मो यस्त्वय़ाद्य कृतो मय़ि |
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
न ह्येष समरं प्राप्य निवर्तेत कथञ्चन |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
न ह्येष समरे शक्यो जेतुमद्य कथञ्चन |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
न ह्येष स्थास्यति चिरं गत एष नराधमः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
न हय़ा न रथो राजन्दृश्यन्ते स्म शरैश्चिताः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
न हय़ा न रथो वीर न यन्ता मम दारुकः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
न हय़ानां क्षतिः काचिन्न रथस्य न मातलेः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
न हय़ान्न रथं तस्य न ध्वजं न घटोत्कचम् |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
नकिञ्चिदुक्त्वा सक्रोध आरुरोह रथं पुनः ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
नकुलं कुशलं युद्धे पराक्रान्तं पराक्रमी |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
नकुलं च चतुःषष्ट्या धृष्टद्युम्नं च पञ्चभिः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
नकुलं च त्रिभिर्वाणैः सहदेवं च सप्तभिः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
नकुलं च त्रिसप्तत्या द्रुपदेय़ांश्च मारिष |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं च पृथा दृष्ट्वा त्वरमाणोपचक्रमे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
नकुलं च युधां श्रेष्ठं सर्वय़ुद्धविशारदम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
नकुलं तु रणे क्रुद्धं विकर्णः शत्रुतापनः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं त्वभिसन्धाय़ क्षेमङ्करमहामुखौ |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
नकुलं पञ्चभिर्वाणैर्जत्रुदेशे समार्दय़त् ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
नकुलं पञ्चभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्दय़त् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
नकुलं पञ्चभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
नकुलं पीडय़ामास पत्रिभिर्नतपर्वभिः ||
१५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं प्रति धर्मात्मा सर्ववुद्धिमतां वरः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
नकुलं रभसं युद्धे दारय़न्तं वरूथिनीम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
नकुलं रभसं युद्धे निघ्नन्तं वाहिनीं तव |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
नकुलं विरथं दृष्ट्वा द्रौपदेय़ो महावलः |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
नकुलं वृषसेनस्तु विद्ध्वा पञ्चभिराय़सैः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं व्यादिशद्राजा कर्मिणामन्ववेक्षणे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सहदेवं च तथान्यान्व्राह्मणर्षभान् |
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
नकुलं सहदेवं च त्वरमाणौ महारथौ |
१५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सहदेवं च ददर्श कुरुनन्दनः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
नकुलं सहदेवं च दुर्मुखं जनमेजय़म् |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
नकुलं सहदेवं च द्वितीय़ं वरय़े वरम् ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
नकुलं सहदेवं च धनं येषां त्वय़ा हृतम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
नकुलं सहदेवं च धर्मराजं च पाण्डवम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सहदेवं च न मोक्ष्यति युधिष्ठिरः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
नकुलं सहदेवं च भीमसेनं च पाण्डवम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
नकुलं सहदेवं च भीमसेनं च भारत ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
नकुलं सहदेवं च भ्रातरौ द्वौ समीक्ष्य च ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमौ भुवि |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सहदेवं च व्यादिदेश द्विजान्प्रति ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९७
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सहदेवं च सर्वांश्चैव प्रभद्रकान् ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं सारथिं कृत्वा द्रोणपुत्रवधे वृतः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
नकुलं हरिकं नाम चपलं ताम्रलोचनम् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
नकुलं हास्तिनपुरं भीष्माय़ भरतर्षभ ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
नकुलः कल्पय़ामास भागं माद्रवतीसुतः ||
२३ ख