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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
कथं यास्यसि विश्वासमहमेष्यामि वा पुनः ||
७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं युक्तान्यनीकानि कथं युद्धं महात्मभिः |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
कथं युद्धमभूत्तत्र तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १३०
वैशम्पाय़न उवाच
कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सवान्धवान् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं युय़ुधिरे पार्था मामकाश्च तरस्विनः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथं युय़ुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
कथं रक्षामि भवतस्तेऽव्रुवंश्चन्द्रमा भव |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
युधिष्ठिर उवाच
कथं रक्ष्यो जनपदः कथं रक्ष्याश्च शत्रवः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
कथं रणे हतः शल्यो धर्मराजेन सञ्जय़ |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं रथात्स न्यपतत्पिता मे वासवोपमः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
कथं रसत्वं व्रजति शोणितं जाय़ते कथम् |
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
युधिष्ठिर उवाच
कथं राजा प्रजा रक्षन्नाधिवन्धेन युज्यते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
युधिष्ठिर उवाच
कथं राजा प्रजा रक्षेन्न च किञ्चित्प्रतापय़ेत् |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
कथं राज्ञः पिता भूत्वा स्वय़ं राजा च सञ्जय़ |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वनेष्वृद्धिविनाकृताः |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं वत्स्यसि शून्येषु वनेष्वम्व प्रसीद मे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं वलक्षय़ो न स्याद्युष्माकं ह्यात्मनश्च मे ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
शक्र उवाच
कथं वहुविधं दानं स्यादल्पमपि वा कथम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
कथं वा ज्ञाय़ते स्वर्गे केन वा ज्ञाय़तेऽप्युत ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं वा निहतो भीष्मः पिता सञ्जय़ मे परैः ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय २००
जनमेजय़ उवाच
कथं वा पञ्च कृष्णाय़ामेकस्यां ते नराधिपाः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
धृतराष्ट्र उवाच
कथं वा पाण्डवान्युद्धे प्रत्युद्यातः परन्तपः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणो वा विदुरोऽपि वा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
कथं वा राजशार्दूल पदं तज्ज्ञातवानसौ ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
कथं वा व्यवहार्यं वै कुर्वीथास्त्वं वृहन्नडे ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेतावलवानिति ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभय़ात् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
कथं वा सम्प्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीनाः पुरं वय़म् ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
कथं वा सुकृतं मे स्यादिति वुद्ध्यान्वचिन्तय़त् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कथं वाले महेष्वासे नृशंसा मर्मभेदिनः |
५० क
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
कथं वासो विकर्तेय़ं न च वुध्येत मे प्रिय़ा |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
अर्जुन उवाच
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तय़न् |
१७ क
मौसल पर्व
अध्याय २
जनमेजय़ उवाच
कथं विनष्टा भगवन्नन्धका वृष्णिभिः सह |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कथं विनिहतः पार्थैः संय़ुगेष्वपराजितः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
कथं विनिहतो वृत्रः शक्रेण भरतर्षभ |
४ क
विराट पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथं विराटनगरे मम पूर्वपितामहाः |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
कथं विवरमद्राक्षीद्भीमसेनस्तवानघ |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
कथं विशिष्टो भ्राता ते भवेदित्येव चिन्तय़ ||
३३ ग
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
कथं विषहितुं शक्यौ रणे जीवितुमिच्छता ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
कथं विष्टम्भितस्तेन भगवान्पाकशासनः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
कथं वृथा न मृत्युः स्यादिति पार्थिवसत्तम ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं वेश्मसु गुप्तेषु स्वास्तीर्णशय़नोचिता |
१० क
वन पर्व
अध्याय १०४
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै ज्ञातय़ो व्रह्मन्कारणं चात्र किं मुने |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
कथं वै नानुपश्येय़ुर्जनाः पश्यन्ति यादृशम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै नाश्वसन्राजा शत्रूञ्जय़ति पार्थिव ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालय़न् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै लोकय़ात्रां तु किंशीलश्च समाचरेत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै विषय़े तस्य नावर्षत्पाकशासनः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै सफला दाराः कथं वै सफलं श्रुतम् ||
१०० ख
सभा पर्व
अध्याय ५
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै सफला वेदाः कथं वै सफलं धनम् |
१०० क