chevron_left  नाथमन्यंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
नाथमन्यं न पश्यामि कुरूणां कुरुसत्तम ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
नाथवन्तं तु सुहृदः प्रतिषेधन्ति पातकात् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
नाथवन्तमथात्मानममन्यत सुतस्तव ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
नाथवन्तमिवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
नाथवन्तश्च भवता पाण्डवा मधुसूदन |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नाथेनानुगतो विद्वन्प्रिय़ेषु परिवर्तिना ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
नाथो वै भूमिपो नित्यमनाथानां नृणां भवेत् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
नादं च चक्रुर्भृशमुत्स्मय़न्तः; शङ्खांश्च दध्मुः शशिसंनिकाशान् ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
नादं चकार वलवान्सर्वसैन्यानि कम्पय़न् ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
नादं महान्तं मुक्त्वा स मूर्छितो गिरिमूर्धनि |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
नादण्डः क्षत्रिय़ो भाति नादण्डो भूतिमश्नुते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
नादण्डस्य प्रजा राज्ञः सुखमेधन्ति भारत ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
नादण्ड्यो विद्यते राज्ञां यः स्वधर्मे न तिष्ठति ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
नादत्त्वा गुरवे शक्यं कृत्स्नमर्थं त्वय़ासितुम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
नाददानं सन्दधानं विकर्षन्तं धनुर्न च |
६१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
नाददीत परस्वानि न गृह्णीय़ादय़ाचितम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
नाददेऽपरवक्तव्यं दत्तं वाचा फलं मय़ा |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
नादातारं भजन्त्यर्था न क्लीवं नापि निष्क्रिय़म् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
भीष्म उवाच
नादान्तस्य क्रिय़ासिद्धिर्यथावदुपलभ्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
नादान्तस्य क्रिय़ासिद्धिर्यथावदुपलभ्यते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
नादारौ क्रमते शस्त्रं दारौ शस्त्रं निपात्यते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
नादास्यच्चेद्वरं मह्यं भवान्पाण्डवनिग्रहे |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
नादितः स वभौ श्रीमान्व्रह्मलोक इवाश्रमः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
नादिर्न मध्यं नैवान्तस्तस्य देवस्य विद्यते ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
नादृश्यत तदा द्रोणो नीहारेणेव संवृतः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
नादृश्यत तदा राजंस्तत्र किञ्चन संय़ुगे |
४७ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभः ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
नादृश्यत परः प्रान्तो नापरस्तत्र भारत ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
नादृश्यत महाराज पार्षतस्य शरैश्चितः ||
३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
नादृश्यन्त च तास्तत्र यातनाः पापकर्मिणाम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
नादृश्यन्त शरैः कीर्णाः शलभैरिव पावकाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
नादेन रिपुसैन्यानां येषां सञ्ज्ञा प्रणश्यति ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
नादेन सर्वभूतानि त्रासय़न्निव भारत ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
नादेन सर्वभूतानि साधु साध्विति भारत ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
नादेवसत्त्वो विनय़ेत्कुरूनस्त्रे महावलान् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
नादेशकाले किञ्चित्स्याद्देशः कालः प्रतीक्ष्यते |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
नादेय़ं तस्य तत्काले किञ्चिदस्ति द्विजातिषु ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
नादेय़ं यस्य मे किञ्चिदपि दाराः सुतास्तथा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
नादेय़ं व्राह्मणेभ्यस्ते गृहे किञ्चन विद्यते ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
नादेय़ं व्राह्मणेष्वासीत्तस्मिन्काले महात्मनः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
नादेय़ं व्राह्मणेष्वासीद्यस्य स्वमपि जीवितम् ||
४५ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
नादैविकमिदं मन्ये यत्र पार्थो धनञ्जय़ः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
नादोऽय़ं कीदृशो देव नैनं विद्म वय़ं विभो |
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
कङ्क उवाच
नाद्भुतं त्वेव मन्येऽहं यत्ते पुत्रोऽजय़त्कुरून् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
नाद्य तात मय़ा शक्यं भोगान्कांश्चन मानुषान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
नाद्य त्वामनुपश्यामि गिरावस्मिन्नरोत्तम |
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
नाद्य नन्दन्ति तूर्याणि मङ्गल्यानि जनार्दन |
११ क