भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
नरेन्द्रनागाश्वसमाकुलाना; मभ्याय़तीनामशिवे मुहूर्ते |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा; शिवेन जग्मुर्मुदिताः स्वमालय़म् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
नरेन्द्रमार्गमाजग्मुस्तूर्णं शतसहस्रशः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
नरेन्द्रसिंह कपटं न वोढुं त्वमिहार्हसि ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
नरेन्द्राणां महाराज समाजग्मुः पितामहम् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
नरेन्द्राभिगता देवान्यथा सप्तर्षय़ो दिवि ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
नरेषु च नरव्याघ्र कृतं स्म कदनं महत् ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
नरो गर्भं प्रविशति तच्चापि शृणु चोत्तरम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
नरो नसंस्थानगतः प्रभुः स्या; देतत्फलं सिध्यति कर्मलोके ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
नरो नाराय़णश्चैव जातौ धर्मकुलोद्वहौ ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
व्राह्मणा ऊचुः
नरो नाराय़णश्चैव तापसाविति नः श्रुतम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
नरो नाराय़णश्चैव सर्वज्ञः सर्वभूतभृत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
नरो नाराय़णश्चैव हरिः कृष्णस्तथैव च ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
नरो रहसि पापात्मा पापकं कर्म वै द्विज ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
नरो वा यदि वा नारी ज्ञातीनां श्रेष्ठतां व्रजेत् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
नरो वाणेन निर्भिन्नो रथादन्यश्च मारिष ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
नरो हि यो वेद गुणानिमान्सदा; स तामसैः सर्वगुणैः प्रमुच्यते ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
नरो हि यो वेद गुणानिमान्सदा; स राजसैः सर्वगुणैर्विमुच्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
नरो हि सर्वो लभते यथाकृतं; शुभाशुभेनात्मकृतेन कर्मणा ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
नरोत्तमौ पाण्डवकेशिमर्दना; वुदाहितावग्निदिवाकरोपमौ |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
नरोऽधर्मात्प्रमुच्येत पापेष्वभिरतः सदा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
नरोऽनुय़ातस्त्विह कर्मभिः स्वै; स्ततः समुत्पद्यति भावितस्तैः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
नरोऽवशः समभ्येति सर्वभूतनिषेवितम् ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
नर्तकाश्चाप्यनृत्यन्त जगुर्गीतानि गाय़काः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
नर्तकैश्चापि नृत्यद्भिर्गाय़नानां च निस्वनैः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
नर्दतः सागरस्येव शव्दो दिवमिवास्पृशत् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
नर्दतां धार्तराष्ट्राणां पुनः पुनररिन्दम |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
नर्दतां शृणु निर्घोषं भीम पर्वतसानुषु ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
नर्दन्तमिव शार्दूलं दृष्ट्वा क्रोष्टा भविष्यसि ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
नर्दमानान्परांश्चैव स्ववलस्य च सङ्क्षय़म् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
नर्दमानो महानादं प्रावृषीव वलाहकः ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
नर्मण्यभिप्रवृत्ते वा प्रवक्तव्यं मृषा भवेत् |
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
नर्मदामथ चासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् |
७१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
नर्मदाय़ामुपस्पृश्य तथा सूर्पारकोदके |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
नरय़ानेन तु ज्येष्ठः पिता पार्थस्य भारत |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
नरय़ुक्तेन यानेन प्रय़यौ सेनय़ा वृता ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
नलं च हृतसर्वस्वमुपलभ्येदमव्रवीत् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
नलं नामारिदमनं दमय़न्त्याः प्रिय़ं पतिम् |
१०० क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
नलं पार्थिवशार्दूलममित्रगणसूदनम् ||
१२० ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
नलं प्रवेशय़ामास यत्र तस्याः प्रतिश्रय़ः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
नलं मां विद्धि कल्याणि देवदूतमिहागतम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
नलं मृगय़ितुं राजंस्तथा व्यसनिनं तदा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये वाहुकमन्ततः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
नलः सञ्चोदय़ामास प्रहृष्टेनान्तरात्मना ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
व्रह्मो उवाच
नलकूवरशापेन रक्षा चास्याः कृता मय़ा ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
नलकूवरशापेन रक्षिता ह्यस्यनिन्दिते ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
नलनीलाङ्गदक्राथमैन्दद्विविदपालिता |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
नलश्च नरशार्दूलो रूपेणाप्रतिमो भुवि |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
नलसेतुरिति ख्यातो योऽद्यापि प्रथितो भुवि |
४५ क