chevron_left  समुद्रनाभ्यांarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
समुद्रनाभ्यां शाल्वोऽभूत्सौभमास्थाय़ शत्रुहन् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
समुद्रनिष्कुटे जाताः परिसिन्धु च मानवाः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रनेमिर्नमते तु तस्मै; यं व्राह्मणः शास्ति नय़ैर्विनीतः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
समुद्रमध्ये राजेन्द्र सर्वलोकनमस्कृतम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
समुद्रमनय़त्पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
समुद्रमपिवत्क्रुद्धः सर्वलोकस्य पश्यतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
जनमेजय़ उवाच
समुद्रमिव गाम्भीर्ये हिमवन्तमिव स्थिरम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
समुद्रमिव घर्मान्ते विवान्घोरो महानिलः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
समुद्रमिव पर्यस्तं त्वदीय़ं तद्वलार्णवम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
समुद्रमिव वार्योघाः प्रावृट्काले महारथाः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
समुद्रवासिनः सर्वान्म्लेच्छजातीन्विजिग्यतुः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
समुद्रवासिने नित्यं हरय़े मुञ्जकेशिने |
९३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रवेगो राजेन्द्र शैलकम्पी तथैव च ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
समुद्रश्च यथा पीतः कारणार्थे महात्मना |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
समुद्रसारं वैडूर्यं मुक्ताः शङ्खांस्तथैव च |
३० क
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
समुद्रसेनपुत्रं तु सामुद्रा रुद्रतेजसम् |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
समुद्रसेनपुत्रश्च चन्द्रसेनः प्रतापवान् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रसेनश्च नृपस्तेषामेवाभवद्गणात् |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
समुद्रसेनो राजा च सह पुत्रेण वीर्यवान् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
विष्णुरु उवाच
समुद्रस्य क्षय़े वुद्धिर्भवद्भिः सम्प्रधार्यताम् |
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
समुद्रस्य प्रमाणं च सम्यगच्छिद्रदर्शन |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
समुद्रस्येव महतो भुजाभ्यां प्रतरन्नरः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
सञ्जय़ उवाच
समुद्रस्येव सङ्क्षोभो मेरोरिव विसर्पणम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
समुद्रा दक्षिणा स्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहाः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
समुद्रांश्चाद्भुताकारानपश्यद्वहुलाकरान् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
समुद्राः सरितः शैलाः प्रत्यूचुस्तं समन्ततः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
समुद्राम्भस्यमोदन्त चरन्तो भीष्म पक्षिणः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रावरणांश्चापि देशान्स समितिञ्जय़ः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्राश्च ह्रदाश्चैव तीर्थानि विविधानि च |
११ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
समुद्राश्चापि चत्वारः समानीताश्च दर्भिणा |
१३६ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा |
१०८ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्ठिर ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
समुद्रास्तस्य रुधिरमाकाशमुदरं तथा ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रे पश्चिमे यानि तीर्थान्याय़तनानि च |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
समुद्रे वडवावक्त्रे प्रक्षिप्य मुनिसत्तमः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
समुद्रो वालुकापूर्ण उज्जानक इति स्मृतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
समुद्रो वालुकापूर्ण उज्जानक इति स्मृतः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रोऽय़ं तव वशे भविष्यति नदीपतिः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्विग्ना विससृपुस्तथान्या भूतजातय़ः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
समुद्वीक्ष्य मुखं राज्ञो वालार्कसमवर्चसः |
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्वेगं जनस्यास्य करिष्यामो न संशय़ः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
समुन्नमग्रतो वस्त्रं पश्चाच्छुध्यति कर्मणा |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
समुन्नानीव वस्त्राणि प्रापुर्दुर्दर्शतां परम् ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण्यु उवाच
समुन्नीता नाध्यगच्छत्को वैनां प्रतिषेधति ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
समुपस्थाय़ वै राजा पप्रच्छ कुरुनन्दनम् ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
समुपाघ्राय़ मूर्धानं संश्लिष्य च पुनः पुनः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
समुपादाय़ रत्नानि विविधानि महान्ति च ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
समुपानीय़ विविधं यद्दग्धं जातवेदसा |
५ ख