कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त संहृष्टो वार्योघ इव पर्वतम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त सङ्ग्रामे विव्याध च पुनः पुनः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त्स्थितं युद्धे मैनाकमिव पर्वतम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़ेतामन्योन्यं यतमानौ महाद्युती ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
नाकरोदीदृशं कस्मान्मत्पुत्रविजय़े धृतः ||
१४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
नाकरोद्वचनं देव्या भय़ात्सुरसुतोपमा ||
२२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
नाकर्मशीले पुरुषे वसामि; न नास्तिके साङ्करिके कृतघ्ने |
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
नाकलोके सुकृतिनां गुणास्त्वय़ुतशो नृणाम् ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
नाकल्पय़न्त देवस्य स्थाणोर्भागं नराधिप ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तय़न्नुभय़ोस्तय़ोः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
नाकल्याणं न कल्याणं प्रध्याय़न्नुभय़ोस्तय़ोः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
नाकस्मात्सिंहनादोऽय़मिति मत्वा व्यवस्थिताः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
नाकस्मादिति जानीमस्तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
नाकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगताः स्त्रिय़ः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
नाकस्य पृष्ठेऽसि नरेन्द्र गन्ता; न शोचितव्यं भवताद्य पार्थ ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
नाकामः कामय़त्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
नाकामः कामय़ानोऽस्ति तस्मात्कामो विशिष्यते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
नाकामो म्रिय़ते जातु न तेन न च व्राह्मणः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
नाकामय़त तं दातुं वरं दाशाय़ शन्तनुः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
नाकारणात्तद्भवति कारणैरुपपादितम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
नाकारो गूहितुं शक्यो वृहस्पतिसमैरपि |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
वृहस्पतिरु उवाच
नाकार्यं कर्तुमिच्छामि व्राह्मणः सन्विशेषतः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते तथा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालतः पुष्पफलं नगानां; नाकालवेगाः सरितो वहन्ति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालतः स्त्रीषु भवन्ति गर्भा; नाय़ान्त्यकाले शिशिरोष्णवर्षाः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालतो भानुरुपैति योगं; नाकालतोऽस्तं गिरिमभ्युपैति |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालतो म्रिय़ते जाय़ते वा; नाकालतो व्याहरते च वालः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालतो यौवनमभ्युपैति; नाकालतो रोहति वीजमुप्तम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालतो वर्धते हीय़ते च; चन्द्रः समुद्रश्च महोर्मिमाली ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नाकालमत्ताः खगपन्नगाश्च; मृगद्विपाः शैलमहाग्रहाश्च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
नाकाले प्रणय़ेदर्थान्नाप्रिय़े जातु सञ्ज्वरेत् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
नाकीर्तय़ित्वा गाः सुप्यान्नास्मृत्य पुनरुत्पतेत् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिं तु शतानीकं भूतकर्मा सभापतिः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिं तु शतानीकं शालपुष्पनिभा हय़ाः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिं पञ्चविंशत्या शराणामार्दय़द्वली ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिश्च शतानीको रथानीकमय़ोधय़न् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिश्चाश्वय़न्तारं रथनीडादपाहरत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिश्चित्रसेनं तु नाराचेनार्दय़द्भृशम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तस्य विशिखैर्वर्म संनतपर्वभिः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तु शतानीकः सौमदत्तिं नरर्षभम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तु शतानीको धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तु शतानीको रथचक्रेण वीर्यवान् |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तु शतानीको वृषसेनं समभ्ययात् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
नाकुलीना नराः पार्श्वे स्थाप्या राज्ञा हितैषिणा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
नाकृतं लभते कश्चित्किञ्चिदत्र प्रिय़ाप्रिय़म् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
नाकृतात्मा कृतात्मानं जातु विद्याज्जनार्दनम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
नाकृतात्मा वेदय़ति धर्माधर्मविनिश्चय़म् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
नाक्रामन्ति तय़ोस्तेऽपि वरदानेन जृम्भतोः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
नाक्रामन्ति यदा शापा वाणा मुक्ताः शिलास्विव |
१६ क