उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
न मे प्रय़ोजनं किञ्चिद्गमने पन्नगाशन |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
न मे भय़ं रौक्मिणेय़ सङ्ग्रामे यच्छतो हय़ान् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
व्राह्मण उवाच
न मे मनो रज्यति भोगकाले; दृष्ट्वा यतीन्प्रार्थय़तः परत्र |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
न मे मन्युर्महाभाग पूतोऽस्मि भगवंस्त्वय़ा |
५९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
न मे मन्युर्महावाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
न मे मानुषलोकोऽय़ं मुहूर्तमपि रोचते |
८२ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
न मे मूढा दिशः पाप त्वदर्थं मे विलम्वनम् ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
अर्जुन उवाच
न मे युधि समोऽस्तीति तदिदं प्रत्युपस्थितम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
न मे रत्नानि न धनं न तथान्ये परिच्छदाः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
न मे रथो नातिरथो मतः पार्थिवसत्तम ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
न मे राष्ट्रे विधवा व्रह्मवन्धु; र्न व्राह्मणः कृपणो नोत चोरः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
युधिष्ठिर उवाच
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भय़ं न च मत्सरः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीय़ते मतिः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
युधिष्ठिर उवाच
न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीय़ते मतिः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
न मे वागनृतं भद्रे प्राह सत्यं भविष्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
शल्मलिरु उवाच
न मे वाय़ुः सखा व्रह्मन्न वन्धुर्न च मे सुहृत् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
न मे विक्रोशतो राजन्हर्तुमर्हसि कुञ्जरम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षय़ः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
न मे विशेषः पुत्रेषु स्वेषु पाण्डुसुतेषु च ||
९७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न मे विशेषो जात्वासीद्धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवैः ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं; सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजय़न्ति |
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
न मे व्यथा विद्यते त्वद्भय़ं वा; सम्पश्यन्त्याः सानुजं धर्मराजम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
न मे व्यथाभवत्काचित्त्वं तु मे किं करिष्यसि ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
न मे व्यलीकं कर्तव्यं त्वय़ा वा तव चानुगैः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
न मे शस्त्रैरनिर्भिन्नमङ्गे द्व्यङ्गुलमन्तरम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
न मे स प्रथमः कल्पो निधने स्वर्गमिच्छतः ||
९३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
न मे सञ्जाय़ते वुद्धिर्वीजमुप्तमिवोषरे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
न मे सीदन्ति मज्जानो न ममोद्वेपते मनः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विरोचन उवाच
न मे सुधन्वना सख्यं प्राणय़ोर्विपणावहे |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
महेश्वर उवाच
न मे सुराः प्रय़च्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
न मे स्यादपराधोऽय़ं महादेवातिसाहसात् ||
५९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
न मे स्यादपराधोऽय़ं यदिदं न कृतं मय़ा ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा; स्तोय़स्य विन्दोरिव पुष्करेषु ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
न मे हस्तः समभवद्वसु तत्प्रतिगृह्णतः |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
न मेऽकरोत्तद्गाङ्गेय़ो न कर्णो न च ते पिता |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
कण्व उवाच
न मेऽत्र रोचते कश्चिदन्यतो व्रज माचिरम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
न मेऽद्य वक्ष्यस्यतिवादिमानि; न्ग्लहं प्रपन्नः सरितामिवागमः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
७६
नल उवाच
न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
न मेऽभ्यसूय़ा कर्तव्या दुःखादेतद्व्रवीम्यहम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
न मेऽस्ति त्वय़ि सन्तापो विगुणेऽपि परन्तप |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
न मेऽस्ति विभवो येन नाशय़ामि तव क्षुधाम् |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय
९
सहदेव उवाच
न मेऽस्त्यविदितं किञ्चित्समन्ताद्दशय़ोजनम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
न मोक्ष्यसे पलाय़ंस्त्वं राजन्युद्धे मनः कुरु |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
न मोघः साय़कः कश्चित्सात्यकेरभवत्प्रभो ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
न मोहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
न मोहात्कुरुते जिष्णुः कर्म पाण्डव गर्हितम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
न म्रिय़ेरन्न जीर्येरन्सर्वे स्युः सर्वकामिकाः |
३७ क