शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतत्त्वय़ि विभो भागिनेय़ोपपद्यते ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
सर्वमेतत्परोक्षं मे यत्त्वं वदसि तापसि |
८० क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतत्प्रदास्यामि भवते नात्र संशय़ः |
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
सर्वमेतत्प्रसङ्ख्याय़ सम्यक्सन्त्यज्य निर्मलः |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतदतिक्रम्य विचार्य च पुनः पुनः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
सर्वमेतदतिक्रम्य श्रुत्वा परमतं भवान् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
सर्वमेतदपत्यस्य कलां नार्हति षोडशीम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
सर्वमेतदपार्थं ते क्षिप्रं तौ सम्प्रसादय़ ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतदभोक्तव्यमन्नं दुष्टाभिसंहितम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
सर्वमेतदवज्ञाय़ न चकारैतदीदृशम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
सर्वमेतदवाप्नोति व्राह्मणो वेदपारगः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि जनाधिप ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
सर्वमेतदशेषेण शृणु मे वदतां वर ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
८१
जनमेजय़ उवाच
सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
सर्वमेतदहं जानन्क्षत्तः प्राप्तोऽद्य कौरवान् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
अर्जुन उवाच
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात्तव द्विज |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
सर्वमेतद्धृषीकेशे तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वमेतद्यथा प्राप्तं सावित्र्या राजकन्यया ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सर्वमेतद्यथात्थ त्वं नैतन्मिथ्या महीपते ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
सर्वमेतद्यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतद्यथावेद्य दर्शय़ामासतुर्मय़म् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
सर्वमेतद्यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तय़ञ्शुचिः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
सर्वमेतद्वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
सर्वमेतद्विजानन्तो न सर्वस्य प्रवोधनात् |
४८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
सर्वमेतद्विनाशान्तं ज्ञानस्यान्तो न विद्यते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सर्वमेतन्नरः शक्र ददाति वसुधां ददत् ||
६७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्वेतावता कृतम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सर्वमेतन्महाप्राज्ञ ददाति वसुधां ददत् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
सर्वमेतन्महावाहो दिव्यभावसमन्वितम् ||
१९९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सर्वमेतन्मय़ा ज्ञेय़ं रथस्यास्य कुटुम्विना |
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
सर्वमेतन्मय़ा राजन्विज्ञातं ज्ञानचक्षुषा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
सर्वमेतन्मय़ा व्रह्मञ्शास्त्रतः परिकीर्तितम् |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेधं च दुष्प्रापं तथा सौत्रामणिं च ये |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेधाश्वमेधाभ्यां यजस्व कुरुनन्दन |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
सर्वमेव ततो विद्यात्तत्तद्वक्तुं न शक्नुमः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
युधिष्ठिर उवाच
सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वमेव महाभाग प्रलय़ं वै गमिष्यति ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
सर्वमेव यथातत्त्वं कथय़ामास भार्गवे ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेव यथावृत्तमतीतं कुरुसङ्क्षय़म् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सर्वमेव यथावृत्तमाचचक्षे शिखण्डिने ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
सर्वमेव हठेनैके दिष्टेनैके वदन्त्युत |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
सर्वमेवात्र विज्ञेय़ं चित्तं ज्ञानमवेक्षते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
सर्वमेवेदमर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते नभः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
सर्वमेवेदमापूर्य तिष्ठन्ति च चरन्ति च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
सर्वरत्नं वृषादर्भो युवनाश्वः प्रिय़ाः स्त्रिय़ः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सर्वरत्नमय़ं चैकं भवनैरुपशोभितम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
सर्वरत्नमय़ं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
सर्वरत्नमय़ी ख्याता त्रिषु लोकेषु पाण्डव ||
१८ ख