अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै व्रह्मलोकमवाप्नुय़ात् ||
१२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै सत्यव्रतपराय़णः ||
११५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै सप्त लोकान्स पश्यति ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै सप्त लोकान्स पश्यति ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै सोमय़ज्ञफलं लभेत् ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् |
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादशमासान्वै सर्वमेधफलं लभेत् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
सदा द्विजातीन्सम्पूज्य किं फलं तत्र मानद |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सदा न विश्वसेद्राजन्पापं कृत्वेह कस्यचित् |
७० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सदा नरः पठंश्चेदं स्वस्तिमान्स सुखी भवेत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
सदा नावि जलं तज्ज्ञाः प्रय़च्छन्ति समाहिताः ||
१८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सदा नॄणां प्रिय़ो दाता प्रिय़दानो दिवं गतः |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
सदा पश्याम्यहं लीनं विजानामि शृणोमि च ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
सदा पूज्या नमस्कार्या रक्ष्याश्च पितृवन्नृपैः |
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा प्रमुदितस्ताभिर्देवकन्याभिरीड्यते ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
सदा प्रसादनं तेषां देवतानामिवाचरेत् ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
सदा भगवती च श्रीस्तथैव नलकूवरः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नराः |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
३७
कर्ण उवाच
सदा भवान्फल्गुनस्य गुणैरस्मान्विकत्थसे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
सदा मनस्वी क्षत्रधर्मे निविष्टः; कुन्त्याः प्राणैरिष्टतमो नृवीरः ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सदा मम प्रिय़ं व्रूत कथमाय़ोधने हतः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
सदा ममैष मान्यश्च सर्वशस्त्रभृतामपि |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
सदा यजति सत्रेण सदा दानं प्रय़च्छति |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
सदा यज्ञेन देवांश्च आतिथ्येन च मानवान् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
सदा योधाश्च हृष्टाश्च येषां तेषां ध्रुवं जय़ः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
सदा रणे स्पर्धते यः स पापः; कच्चित्त्वय़ा निहतस्तात युद्धे ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सदा वर्हिनिभः कामं प्रसक्तिकृतमाचरेत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
सदा विवर्जनीय़ो वै पुरुषेण वुभूषता ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
सदा संनिहितो यत्र हरिर्वसति भारत |
१०६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
सदा संरव्धनय़नौ सदा चानिमिषेक्षणौ |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
सदा सङ्ग्रामे स्पर्धते यः स कृष्णं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
सदा सदासत्कृतः स्यान्न मृत्युरमृतं कुतः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
सदा सलिलराजस्य प्रतिष्ठा चादिरेव च ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
सदा सुचेताः सहते नरस्येहाल्पचेतसः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सदा स्पर्धसि सङ्ग्रामे फल्गुनेन यशस्विना |
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सदा हि गत्वा ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
सदा हि तस्य स्पर्धासीदर्जुनेन विशां पते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
सदा हि ददतां धर्मः सदा चाप्रतिगृह्णताम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
सदा हि दर्शनाकाङ्क्षी श्रेय़ोऽन्वेषी च वो हरिः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वय़ि मे प्रभो ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
सदा ह्यशास्त्रकुशलाः सर्वत्रापरिनिष्ठिताः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
सदाचारः स्मृतिर्वेदास्त्रिविधं धर्मलक्षणम् |
३ क