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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
नाद्य लोभवशं प्राप्तो दुःखं प्राप्स्याम्यनात्मवान् ||
४७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
नाद्य शक्या मय़ा हन्तुं पाण्डवा जितकाशिनः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
नाद्याहं यदि पश्यामि का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नाद्रिय़न्ते पशून्वद्ध्वा यवसेनोदकेन च ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
नादय़न्रथघोषेण कम्पय़न्निव मेदिनीम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
नादय़न्रथघोषेण तत्पुरं समुपाद्रवत् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
नादय़न्रथघोषेण पृथिवीं द्यां च भारत ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
नादय़न्रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
नादय़न्रथघोषेण सर्वाः सोपदिशो दश ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
नादय़न्वै दिशः सर्वा रथघोषेण सारथे |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
नादय़न्स दिशो भीष्मः प्रदिशश्च महाय़शाः ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
नादय़ामासुरसुरास्ते चापि निहता मय़ा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
नाधनस्यास्त्ययं लोको न परः पुरुषोत्तम ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
नाधनो धर्मकृत्यानि यथावदनुतिष्ठति |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
वृषपर्वो उवाच
नाधर्मं न मृषावादं त्वय़ि जानामि भार्गव |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
नाधर्मं समवाप्नोति नरः श्रेय़श्च विन्दति ||
२८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
नाधर्मः श्लिष्यते प्राज्ञमापः पुष्करपर्णवत् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २९१
सूर्य उवाच
नाधर्मश्चरितः कश्चित्त्वय़ा भवति भामिनि |
१४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
नाधर्मश्चरितः कश्चिद्राजपुत्र्या परन्तप |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
नाधर्मश्चरितो राजन्सद्यः फलति गौरिव |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
नाधर्मश्चरितो राजन्सद्यः फलति गौरिव |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
नाधर्मे कुरुते वुद्धिं न च पापेषु वर्तते ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
नाधर्मे ते धीय़ते पार्थ वुद्धि; र्न संरम्भात्कर्म चकर्थ पापम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २५९
व्रह्मो उवाच
नाधर्मे रमते वुद्धिरमरत्वं ददामि ते ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
नाधर्मेण जितः कश्चिद्व्यथते वै पराजय़ात् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
नाधर्मेण न धर्मेण वध्यन्ते छिन्नसंशय़ाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपतिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
नाधर्मेणागमः कश्चित्परस्तस्य प्रवर्तते ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
नाधर्मो विद्यते कश्चिच्छत्रून्हत्वातताय़िनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
नाधर्मो विद्यते तत्र धर्म एव तु केवलः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
नाधर्मोऽभूद्वरारोहे स हि धर्मः पुराभवत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
राजपुत्र उवाच
नाधर्मय़ुक्तानिच्छेय़मर्थान्सुमहतोऽप्यहम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
नाधर्षय़त्ततः कश्चिच्चारनित्याच्च दर्शनात् ||
१३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
नाधिकं दशमाद्दद्याच्छूद्रापुत्राय़ भारत ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
नाधिकं विद्यते तस्मादित्याहुः परमर्षय़ः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
नाधिगच्छाम शान्तिं च भय़ात्त्राय़स्व नः प्रभो ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
नाधिजग्मुस्तदा निद्रां तेऽद्य सुप्ता महीतले ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
नाधिज्यमपि यच्छक्यं कर्तुमन्येन गाण्डिवम् |
६९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
नाधितिष्ठेत्तुषाञ्जातु केशभस्मकपालिकाः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
नाधृतिर्भूतिमाप्नोति वुध्यस्वैवं प्रवोधितः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
व्राह्मण उवाच
नाध्यगच्छं यदा तस्यां स्वप्रजा मार्गिता मय़ा ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
व्राह्मण उवाच
नाध्यगच्छं यदा तासु तदा मे कश्मलोऽभवत् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
व्राह्मण उवाच
नाध्यगच्छं यदा पृथ्व्यां मिथिला मार्गिता मय़ा |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
नाध्यगच्छंस्तदा राजन्कवन्धाय़ुतसङ्कुले ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
नाध्यगच्छच्च मृगय़ंस्तां गां मुनिरुदारधीः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
नाध्यगच्छत्तथा नाथं कृष्णा नाथवती सती ||
८६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
नाध्यगच्छत्तदा नाथं कृष्णा नाथवती सती ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
नाध्यगच्छत्तदा शान्तिं तावपश्यन्नरर्षभौ ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
नाध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ||
७ ख