chevron_left  नाध्यगच्छत्पतिंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
नाध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
नाध्यगच्छत्परं शक्त्या वाणमेतेषु सप्तसु |
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
नाध्यगच्छत्परं श्रेय़ो योगान्मतिमतां वरः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
नाध्यगच्छद्वलिर्लोके तीर्थमन्यत्र वै द्विजात् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
नाध्यगच्छमहं यस्मान्ममेदमिति यद्भवेत् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
नाध्यगच्छमहं वुद्ध्या ममेदमिति यद्भवेत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
नाध्यवस्यद्यदा कश्चित्सागरस्य विलङ्घने |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
नाध्यापय़न्त्यधीय़न्ते यजन्ते न च याजकाः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
नाध्यापय़ेत्तथोच्छिष्टो नाधीय़ीत कदाचन |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
नाध्यापय़ेदधीय़ीत प्रजाश्च परिपालय़ेत् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
नानतं वलवद्भिर्हि धनुर्वेदपराय़णैः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
नानद्यमानं निनदैर्मनोज्ञै; र्वादित्रगीतस्तुतिभिश्च नृत्तैः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
नानद्यमानः पर्जन्यः सानिलः शुचिसङ्क्षय़े |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
नानद्यमानः पर्जन्यो मिश्रवातो हिमात्यये |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
देवा ऊचुः
नाननुज्ञातभूमिर्हि यज्ञस्य फलमश्नुते ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
नानपत्यो भवेत्प्राज्ञो दरिद्रो वा कदाचन |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
नानर्तुकवनोपेतं सदापुष्पफलं शुभम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
नानर्थकं सान्त्वय़ति प्रतिज्ञाय़ ददाति च |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
नानर्थकृत्त्यक्तकलिः कृतज्ञः; सत्यो मृदुः स्वर्गमुपैति विद्वान् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
नानर्थकेनार्थवत्त्वं कृतघ्नेन समाचरेत् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
नानर्थय़न्विजानाति मित्राणां सारफल्गुताम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
नाना व्यवसिताः सर्वे सर्पदेवर्षिदानवाः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
नानाकर्मफलोपेता नानाकर्मनिवासिनः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
नानाकर्मसु युक्तानां वहुकर्मोपजीविनाम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
नानाकृतिवलाश्चान्ये जलक्षितिविचारिणः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
नानागसं मां पाशेन सन्तापय़ितुमर्हसि ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
नानागुल्मलताच्छन्नं नानाद्रुमसमावृतम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १११
लोमश उवाच
नानागुल्मलतोपेतैः स्वादुकामफलप्रदैः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
नानागोष्ठा विहिता एकदोहना; स्तावश्विनौ दुहतो घर्ममुक्थ्यम् ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
नानाग्राहसमाकीर्णं नानाद्विजगणाय़ुतम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
नानाङ्गावय़वैर्हीनांश्चकारारीन्धनञ्जय़ः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
नानाचिह्नधरा राजन्रथेष्वासन्महाध्वजाः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
नानाजनपदाकीर्णो मणिविद्रुमचित्रितः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
नानाजनपदाध्यक्षाः सगणा जातमन्यवः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
नानाजनपदाश्चोग्राः क्षत्रिय़ाणाममर्षिणाम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
नानाजनपदेभ्यश्च रथानामय़ुतं पुनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
नानाजनौघं युधि सम्प्रवृद्धं; गाङ्गं यथा वेगमवारणीय़म् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
नानाजात्या हतास्तत्र नानादेशसमागताः ||
५० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
नानातोय़समाकीर्णं तडागैरुपशोभितम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति; धर्मं च वासं च परिश्रमं च |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
करालजनक उवाच
नानात्वैकत्वमित्युक्तं त्वय़ैतदृषिसत्तम |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
नानात्वैकत्वमेतावद्द्रष्टव्यं शास्त्रदृष्टिभिः ||
२१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
नानादिगागता वीराः प्राय़शो निधनं गताः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
नानादिगागतान्राजन्राक्षसान्प्रतिषिध्य वै ||
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
नानादिग्भ्यः समागम्य नानादेश्या नराधिपाः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
नानादिग्भ्यः समाहूताः सहय़ाः सरथद्विपाः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
नानादिग्भ्यश्च सम्प्राप्तान्व्रातानश्वशकान्प्रति |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
नानादेशसमावृत्ताः क्षत्रिय़ा यत्र सञ्जय़ |
३९ क