वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
पानीय़मन्तिके पश्य वृक्षान्वाप्युदकाश्रय़ान् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
पानीय़मपरे पीत्वा पर्याश्वास्य च वाहनम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
पानीय़मभिकाङ्क्षेऽहं राज्ञस्तान्प्रत्यभाषत ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पानीय़स्य क्रिय़ा नक्तं न कार्या भूतिमिच्छता ||
११३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पानीय़स्य प्रदानेन कीर्तिर्भवति शाश्वती |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
पानीय़स्य प्रदानेन प्रीतिर्भवति शाश्वती ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
पानीय़ार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम् ||
६ ग
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पानीय़ार्थे पराक्रान्ता यत्र ते भ्रातरो हताः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
पानैश्च विविधैर्हृद्यैः परां प्रीतिमवापतुः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
पान्तु वः सततं देवाः कीर्तिताकीर्तिता मय़ा ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
पाप एव वधः प्रोक्तो नरकाय़ेति निश्चय़ः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
पापं कर्म कृतं किञ्चिन्न तस्मिन्यदि विद्यते |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
पापं कुर्वन्ति यत्किञ्चित्प्रजा राज्ञा ह्यरक्षिताः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
पापं कुर्वन्पापकीर्तिः पापमेवाश्नुते फलम् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
पापं कुर्वन्पापवृत्तः पापस्यान्तं न गच्छति |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
पापं कृतं न स्मरतीह मूढो; विवर्तमानस्य तदेति कर्तुः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
वृहस्पतिरु उवाच
पापं कृत्वा न मन्येत नाहमस्मीति पूरुषः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
पापं कृत्वा हि मन्येत नाहमस्मीति पूरुषः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
पापं च यो नेच्छति तस्य हन्तु; स्तस्मै देवाः स्पृहय़न्ते सदैव ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
पापं चापि तथैव स्यात्पापेन मनसा कृतम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
पापं चिन्तय़ते चापि व्रवीति च करोति च ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
पापं चिन्तय़ते चैव प्रव्रवीति करोति च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
पापं चेत्पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते |
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
पापं धर्मं तथा मोक्षं निर्वेदं चैव भारत ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
पापं न भविता तेऽद्य अजेय़श्च भविष्यसि |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
पापं प्रज्ञां नाशय़ति क्रिय़माणं पुनः पुनः |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
पापं प्रणश्यते सर्वं स्त्रिय़ो वा पुरुषस्य वा ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पापं वालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जय़द्रथम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
पापं हन्तेव मीनानां पदमाप्नोति सोऽजरम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वय़ं कृतम् |
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
पापं हि यत्त्वय़ा कर्म घ्नता द्रोणं पुरा कृतम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
पापः क्षत्रिय़धर्मोऽय़ं वय़ं च क्षत्रवान्धवाः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पापः पापं वचः कर्णः शृण्वतस्तव भारत ||
८० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
पापकर्मा ध्रुवं द्रौणिः प्रधक्ष्यत्यस्त्रतेजसा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
पापकर्मात्ययाय़ैव सङ्करं तेन पुष्यति |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
पापजित्प्रतिविन्ध्यश्च चित्रवर्मा सुवास्तुकः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पापजिन्नाम राजासीद्भुवि विख्यातविक्रमः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
पापदेशज दुर्वुद्धे क्षुद्र क्षत्रिय़पांसन |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
पापदेशोद्भवा म्लेच्छा धर्माणामविचक्षणाः ||
९१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
पापमाचक्षते नित्यं हृदय़ं पापकर्मिणाम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
पापमुत्सृजते लोके सर्वं प्राप्य सुदुर्लभम् |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
पापमेवाश्रय़ेदस्मान्हत्वैतानातताय़िनः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पापस्य पापव्यसनान्वितस्य; विमूढवुद्धेरलसस्य भीरोः |
१०३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
पापस्य यदधिष्ठानं तच्छृणुष्व नराधिप |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
युधिष्ठिर उवाच
पापस्य यदधिष्ठानं यतः पापं प्रवर्तते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
पापस्य लोको निरय़ोऽप्रकाशो; नित्यं दुःखः शोकभूय़िष्ठ एव |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
पापस्यास्य नृशंसस्य त्यक्तधर्मस्य दुर्मतेः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
पापा अपि तदा क्षेमं न लभन्ते कदाचन |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापनिश्चय़ः |
१७ ख