भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
प्राधान्यतो मय़ैतानि कीर्तितानि तवानघ ||
१४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
प्राधान्यतोऽथ यशसा कीर्तिताः प्राणतश्च ते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
प्राधान्येन वहुत्वात्तु न सर्वे परिकीर्तिताः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
प्राधान्येन हि भूय़िष्ठममेय़ाः केशवे गुणाः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
३१
शौनक उवाच
प्राधान्येनापि नामानि श्रोतुमिच्छामहे वय़म् ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राधीतद्विजघोषैश्च क्वचित्क्वचिदलङ्कृतम् |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राधीतद्विजमुख्या सा सम्प्रज्वालितपावका |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
प्राध्मापय़ं रणे शङ्खं पुनर्हेमविभूषितम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राध्मापय़त भूतानां त्रासनं वलिनामपि ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
प्राध्मापय़त्पाञ्चजन्यं शङ्खप्रवरमोजसा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राध्वं कृत्वा नमश्चक्रे कुवेराय़ वृकोदरः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रानृत्यदिव सम्वाधे चापहस्तो धनञ्जय़ः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप चैव मुहूर्तेन स्वस्थानं देवसञ्ज्ञितम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
प्राप व्रह्मर्षिसमितं विश्वेन व्रह्मणा युतम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्रापतन्मनुजास्तत्र रथेभ्यो रथिनस्तदा ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
प्रापतन्स्यन्दनेभ्यस्ते सार्धं सूतैर्गतासवः |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रापितं ते मय़ा वित्तं वहुरूपमनन्तकम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रापुरादित्यवर्णं तं पुरुषं तमसः परम् |
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
प्राप्तं कलिय़ुगं विद्धि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य च |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्तं तु कालं त्वभिपद्य पश्चा; त्किं मामिदानीमतिवेलमात्थ ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
प्राप्तं दुनोति हृदय़ं तीव्रशोकाय़ रन्धय़न् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
प्राप्तं नूनं मय़ा घोरं भय़ं वैवस्वतादपि ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तं पुत्रफलं त्वत्तः प्रीतिर्मे विपुला त्वय़ि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदय़ेनापराजितः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदय़ेनापराजितः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
प्राप्तं राज्यं परित्यज्य व्रह्मचर्ये धृतव्रतः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तः परमधर्मात्मा सोऽय़ोध्याय़ां नृपोऽभवत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तः परमसङ्क्लेशो यथा पापैर्महात्मभिः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
प्राप्तः प्रकृतितो धर्मो नाधर्मो मानवान्प्रति |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तः स कालो मर्तव्यं यत्र सत्यवता नृप ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
प्राप्तः सत्यं च ते ज्ञात्वा प्रीतिर्मे परमा त्वय़ि ||
७८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
आस्तीक उवाच
प्राप्तः सुविपुलो धर्मः श्रुत्वा पापविनाशनम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
प्राप्तः स्यां यद्यहं वीर वधं तस्मिन्महारणे |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन्वाच्यमस्ति नः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
प्राप्तः स्वर्गफलं चैव तमुवाच पितामहः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तकालं च आचक्षे भीष्मोऽय़मनुय़ुज्यताम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तकालं च ते सर्वे मेनिरे मन्त्रिसत्तमाः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तकालं तु यत्कार्यं त्वय़ा तच्छ्रूय़तां मम ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
प्राप्तकालं मनुष्येण स्वय़ं कार्यमरिन्दम ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
द्रुपद उवाच
प्राप्तकालं महावाहुः सा वुद्धिर्निश्चिता मम ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्राप्तकालं सुवलवन्निश्चित्य वहुधा हि मे |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तकालमनुध्यान्तः सेहुरुत्तमपूरुषाः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तकालममित्रघ्नो रामं सम्वोधय़न्निव ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्राप्तकालमहं मन्ये प्रवेशं तैः सहाभिभो |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
युय़ुत्सुरु उवाच
प्राप्तकालमिति ज्ञात्वा विदुरः सर्वधर्मवित् |
९० ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तकालमिदं वाक्यं तदादत्स्व कुरुष्व च ||
१० ख