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शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
परमात्मानमीशानमात्मनः प्रभवं तथा ||
१०५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
परमात्मेति यं प्राहुः साङ्ख्ययोगविदो जनाः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
परमाद्भुतसङ्काशं षट्सहस्रशतह्रदम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
परमान्नस्य यत्नेन न च स प्रत्यपालय़त् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २५९
विभीषण उवाच
परमापद्गतस्यापि नाधर्मे मे मतिर्भवेत् |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
परमापद्गतेनापि न स्म तात त्वय़ा रणे |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
परमाप्नोति संशान्तमचलं दिव्यमक्षरम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मय़म् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
परमास्त्रविदं वीरं जघान भरतर्षभम् ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
परमास्त्राणि धुन्वानाः सौभद्रमभिदुद्रुवुः ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
परमाय़ुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
परमित्यव्रवीत्प्रीतस्तदा भरतसत्तम ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
परमित्येव सन्तुष्टास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
परमिदमिति भूमिपो विचिन्त्य; प्रवरमृषेर्वचनं ततो महात्मा |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
परमेण च रूपेण गिरा च स्मितपूर्वय़ा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
विष्णुरु उवाच
परमेष्ठिनमाज्ञाप्य अगस्त्यस्याश्रमं यय़ुः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
शल्मलिरु उवाच
परमेष्ठी तथा नैव येन रक्षति मानिलः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
परमेष्ठी त्वहङ्कारोऽसृजद्भूतानि पञ्चधा |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
परमोऽनुग्रहो मेऽद्य यत्प्रतर्को न मे वृथा |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
पररन्ध्रे पराक्रान्ताः स्वरन्ध्रावरणे स्थिताः ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
परराष्ट्राटवीस्थेषु यथा स्वविषय़े तथा ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
परर्द्धिः परमः स्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
द्रोण उवाच
परलोकं गमिष्यामः स्वैः स्वैः कर्मभिरन्विताः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
परलोकगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
परलोकगतस्यापि गमिष्याम्यनृणः पितुः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
परलोकगतिस्थानां मुनिय़ज्ञक्रिय़ा इव ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
परलोकगुरुं चैव राजानं योऽवमन्यते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
परलोकमिमं चापि सर्वं शंसतु नो भवान् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
परलोकार्णवमुखी गृध्रगोमाय़ुमोदिनी ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
परवत्यस्मि चाप्युक्तः प्रणय़िष्ये नय़ेन च |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
युधिष्ठिर उवाच
परवन्तो वय़ं राजंस्त्वय़ि सर्वे सहानुगाः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
शल्य उवाच
परवाच्येषु निपुणः सर्वो भवति सर्वदा |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
दुर्योधन उवाच
परवानस्मि भवति प्रेष्यकृद्रक्ष मे यशः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
परवित्तापहारस्य क्रोधस्याप्रशमस्य च |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
परवीर्यं समाश्रित्य यः समाह्वय़ते परान् |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
परवुद्धिं च निन्दन्ति स्वां प्रशंसन्ति चासकृत् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
परशुं च ददौ देवो दिव्यान्यस्त्राणि चैव मे ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
परशुवनशय़ो निपतितो; वसति च महानिरय़े भृशार्तः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
परशुस्तीक्ष्णधारश्च दत्तो रामस्य यः पुरा |
१३७ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्माद्वृद्धतमोऽच्युतः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
परश्चेदेनमतिवादवाणै; र्भृशं विध्येच्छम एवेह कार्यः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
परश्चेदेनमधिविध्येत वाणै; र्भृशं सुतीक्ष्णैरनलार्कदीप्तैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
परश्रिय़ा न तप्यन्ते ये सन्तः पुरुषर्षभाः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
परश्वधक्षतं रक्षः सुस्राव रुधिरं वहु |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
परश्वधांश्च विविधान्प्रसक्ष्येऽहमसंशय़म् ||
५४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
परश्वधास्तैलधौताश्च खड्गाः; प्रदीप्ताग्राः पट्टिशास्तोमराश्च ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
परश्वधाय़ुधो देव अर्थकारी सुवान्धवः |
९६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
परश्वधेन तीक्ष्णेन चिच्छेद च पुनः पुनः ||
६१ ख