आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाच राजशार्दूल वाष्पगद्गदय़ा गिरा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
प्रोवाच लोकान्मूढात्मा कालेनोपनिपीडितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
प्रोवाच वचनं धीमाञ्जाजलिर्जपतां वरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रोवाच वचनं वाग्मी तां वानरपतिः पतिः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
भीष्म उवाच
प्रोवाच वचनं श्लक्ष्णं प्राज्ञो मधुरय़ा गिरा ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठः पुनरेव स तद्वचः |
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठस्तं नृपं जनमेजय़म् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो वचनं राजसत्तमः ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाच वाक्यं धर्मज्ञः सैन्धवान्युद्धदुर्मदान् ||
९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
प्रोवाच व्येतु वस्त्रासो व्रूत किं करवाणि वः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
प्रोवाच श्वा मुनिं तत्र यत्तच्छृणु महामते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
प्रोवाच सहितं देवैः सोमपावश्विनौ कुरु ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
प्रोवाच सुतरां प्राज्ञस्तस्मादेतच्चिकीर्षितम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
प्रोवाच सुमहातेजा धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
प्रोवाचाखिलमव्यग्रं तपस्वी सुतपस्विने ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाचातीन्द्रिय़ज्ञानो विधिना सम्प्रचोदितः ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाचाथ सुसंरव्धो भीमः स परुषं वचः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाचेदं वचः काले तदा धर्मभृतां वरः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
प्रोवाचेदं वचः कृष्णो मेघदुन्दुभिनिस्वनः ||
५६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाचेदं वचो वाग्मी धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोवाचेदं वचो वाग्मी प्रसाद्य शिरसा मुनीन् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
प्रोवाचेदं वासुदेवं समीक्ष्य; पार्थो धीमाँल्लोहितान्ताय़ताक्षः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
प्रोवाचौघवती विप्रं केनार्थः किं ददामि ते ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
प्रोषितस्य परिभ्रष्टा गौरेका मम गोधने ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रोष्य वर्षसहस्रं तु नरनाराय़णाश्रमे |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनः पुनरुदीक्ष्य वै ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद्दृढविक्रमम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
प्रौष्ठपदं तु यो मासमेकाहारो भवेन्नरः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
उत्तङ्क उवाच
प्रय़च्छ कुण्डले मे त्वं सत्यवाग्भव पार्थिव ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिन्दम |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
प्रय़च्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिन्दम ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्रय़च्छ पुरुषाय़ाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनञ्जय़म् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
प्रय़च्छ मामगस्त्याय़ त्राह्यात्मानं मय़ा पितः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रय़च्छ मेदिनीं राज्ञे शक्राय़ेव यथा हरिः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
प्रय़च्छ युद्धमित्येवं वादिनः स्मो द्विजोत्तम ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
प्रय़च्छ राज्ञे निहतारिसङ्घां; यशश्च पार्थातुलमाप्नुहि त्वम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छ राज्यं पार्थानां यशो धर्ममवाप्नुहि ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
प्रय़च्छ राज्यार्धमपेतमोहः; सवाहनं त्वं सपरिच्छदं च |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
प्रय़च्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं; कृतं हि ते कार्यमन्यैरशक्यम् |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छते यः कपिलां सचैलां; कांस्योपदोहां कनकाग्रशृङ्गीम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
प्रय़च्छतोऽर्थान्विपुलान्वन्याश्रमपदं भवेत् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छध्वं यथाकामं देवा इव सुवर्चसः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
प्रय़च्छन्तीह ये कामान्देवत्वमुपय़ान्ति ते ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
प्रय़च्छन्तु च ते राज्यमनीशास्ते भवन्तु च |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छन्तु प्रदातव्यं मा वः कालोऽत्यगादय़म् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छन्त्यपरे कन्यां मिथुनेन गवामपि |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
प्रय़च्छामः करान्सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़च्छेतां महार्हाणि स्त्रीणां ते स्म मदोत्कटे ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
भीम उवाच
प्रय़च्छोत्तिष्ठ मार्गं मे मा त्वं प्राप्स्यसि वैशसम् ||
६ ख