chevron_left  परश्वधैर्भिण्डिपालैःarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
परश्वधैर्भिण्डिपालैः शक्तितोमरमुद्गरैः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
परश्वधैश्चाप्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि युध्यताम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्धन ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
परस्त्रिय़ो नाभिलषेद्वाचाथ मनसापि वा |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
परस्त्रीकामसंमत्तः समागच्छत पश्यत ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
परस्त्वेनं गर्हय़तेऽपराधे; प्रशंसते साधुवृत्तं तमेव ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
परस्परं च खादन्ति सर्वथा धिगराजकम् ||
३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं च नक्षत्रं हन्यमानं पुनः पुनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
परस्परं च प्रत्यघ्नन्सर्वप्रहरणान्यपि ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
परस्परं चाप्यपरे पट्टिशैरसिभिस्तथा |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
परस्परं चुक्रुशुरार्तिजं भृशं; तदाश्रु नेत्रैर्मुमुचुर्हि शव्दवत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
परस्परं तथैवाहुश्चातुराश्रम्यमेव तत् |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
परस्परं तदा योधा अनय़न्यमसादनम् ||
१२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
परस्परं तौ विशिखैः सुतीक्ष्णै; स्ततक्षतुः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं तय़ोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपलभ्यते ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
परस्परं तय़ोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपलभ्यते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
परस्परं प्राप्य महान्महात्मा; विशेत योगी नचिराद्विमुक्तः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
परस्परं भक्षय़न्तो मत्स्या इव जले कृशान् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
परस्परं भावय़न्तः श्रेय़ः परमवाप्स्यथ ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
परस्परं भृशमभिगर्जतां मुहू; रणाजिरे भृशमभिसम्प्रवर्तिते ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
परस्परं वर्तमानान्द्रुपदस्यात्मजां प्रति |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
परस्परं वाणगणैर्महात्मनोः; प्रवर्षतोर्मद्रपपाण्डुवीरय़ोः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
परस्परं विजानीमो ये चाय़ुध्यन्नभीतवत् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
परस्परं विलुम्पन्ते सारमेय़ा इवामिषम् |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं समागम्य योधानां भरतर्षभ ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
परस्परं समासाद्य तव तेषां च संय़ुगे ||
७६ ख
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं समासाद्य व्रह्मदण्डवलात्कृतान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
परस्परं समासाद्य संनिपेतुरभीतवत् ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं सुसूक्ष्मेषु शोकेष्वाश्वासय़न्स्म याः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं स्पर्धय़ा प्रेक्षमाणाः; सङ्कल्पजेनापि परिप्लुताङ्गाः |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परकृतं नाशमतः प्राप्स्यन्ति यादवाः ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
व्राह्मण उवाच
परस्परगुणानेते न विजानन्ति कर्हिचित् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
परस्परज्ञाः संहृष्टा व्यवधूताः सुनिश्चिताः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
परस्परज्ञाः संहृष्टास्त्यक्तप्राणाः सुनिश्चिताः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
परस्परद्वेषरतौ प्रमाणवलदर्पितौ ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसङ्करः ||
१८० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
परस्परप्रस्खलिताः समाहता; भृशं च तत्तत्कुलभाषिणो हताः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
परस्परभय़ं घोरमस्माकं हि न संशय़ः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
परस्परभय़ाच्चैव शून्यभूय़िष्ठनिर्जना ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परभय़ादेके पापाः पापं न कुर्वते |
६ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परमथोचुस्ते विषादभय़कम्पिताः ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
परस्परमनुज्ञाप्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
परस्परमविद्यां वै तन्निवोधानुपूर्वशः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
परस्परमवेक्षेतां कालानलसमौ युधि ||
५० ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
परस्परमवेक्षेतां दहन्ताविव लोचनैः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
परस्परमसङ्घुष्टान्विजिगीषूनलोलुपान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २२
सूत उवाच
परस्परमिवात्यर्थं गर्जन्तः सततं दिवि ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
परस्परमुदीक्षन्तः परस्परकृतागसः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
परस्परमुदीक्षन्ते वहवो जीवजीवकाः ||
७४ ख