उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसस्रुर्योजय़िष्यन्तो रथं चक्रगदाभृतः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
सहदेव उवाच
प्रसहिष्यति सङ्ग्रामे भीष्मं तांश्च महारथान् ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
प्रसहेदन्यथा कर्तुं किमु शापं मनीषिणाम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
प्रसह्य एव वातेन शाखास्कन्धं विमर्दितुम् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
प्रसह्य जीवितक्षय़े तपो महत्समाचर ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसह्य पुरुषव्याघ्रमिन्द्रो वैरोचनिं यथा ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसह्य मन्दमैश्वर्ये न निय़च्छत यन्नृपम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रसह्य मां पातय़ लोकनाथ; रथोत्तमाद्भूतशरण्य सङ्ख्ये ||
९४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसह्य वन्धने वद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुन्धराम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसह्य वित्तान्यादत्त पार्थिवेभ्यः परन्तपः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्क; स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ||
२१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसह्य वोऽस्माद्विषय़ादभिधावत पाण्डवाः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रसह्य शङ्खौ धमतुः सुघोषौ; मनांस्यरीणामवसादय़न्तौ ||
५५ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
प्रसह्य समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्कलाम् |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
प्रसह्य सहसा सर्वे सन्तस्थुः कालमोहिताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वासुदेव उवाच
प्रसह्य हरणं चापि क्षत्रिय़ाणां प्रशस्यते |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
प्रसह्य हरणं तात राक्षसं धर्मलक्षणम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
प्रसह्य हि नय़ाम्येष मिषतां वो नराधिपाः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
प्रसह्यकारिणः केचित्कार्पासमृदवोऽपरे |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रसादं कुरु तन्वङ्गि क्रिय़तां परिकर्म ते ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
प्रसादं कुरु दीनानां पाण्डवानां विशां पते ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादं कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगाः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
पितर ऊचुः
प्रसादं कुरु नो देव श्रेय़ो नः संविधीय़ताम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नय़स्व माम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
यय़ातिरु उवाच
प्रसादं कुरु मे व्रह्मञ्जरेय़ं मा विशेत माम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
प्रसादं कुरु मे व्रह्मन्नस्त्रलुव्धस्य भार्गव ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
प्रसादं कुरु लोकानां निय़च्छ क्रोधमात्मनः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
प्रसादं कुरु विप्रर्षे न मे स्यात्क्षत्रिय़ः सुतः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं ददस्व च ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं प्रय़च्छ च ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादं कृतवान्वीर रविसोमसमप्रभः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
प्रसादं मे कुरुष्वेति पुनः पुनररिन्दम ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
प्रसादं शङ्करात्प्राप्य दुःखिताः सुखमाप्नुवन् ||
११४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
प्रसादः क्रिय़तां चैव देवराजस्य याचतः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादनं पाण्डवस्य प्राप्तकालं हि रोचय़े |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
प्रसादमकरोद्धीमानानय़च्च परिक्षितम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादमस्य वालस्य तस्मात्त्वं कर्तुमर्हसि ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
प्रसादश्च कृतस्तेन ममैवं द्विपदां वर ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
सावित्र्यु उवाच
प्रसादाच्चैव तस्मात्ते स्वय़म्भुविहिताद्भुवि |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मातर ऊचुः
प्रसादात्तव पूज्याश्च प्रिय़मेतत्कुरुष्व नः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादात्तस्य विप्रर्षेर्व्यासस्यामिततेजसः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
प्रसादात्प्रादुरभवत्पद्मं पद्मनिभेक्षण |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
कीट उवाच
प्रसादात्सत्यसन्धस्य भवतोऽमिततेजसः |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
जनमेजय़ उवाच
प्रसादादृषिपुत्रस्य मम कामः समृध्यताम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
प्रसादाद्देवदेवस्य त्र्यम्वकस्य महात्मनः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
धृतराष्ट्र उवाच
प्रसादाद्ध्रिय़ते यस्य प्रत्यक्षं तव सञ्जय़ ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
प्रसादाद्भृगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोवलात् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादार्थं मय़ा तेऽय़ं शिरस्यभ्युद्यतोऽञ्जलिः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादितं ह्यस्य मय़ा मनोऽभू; च्छुश्रूषय़ा स्वेन च पौरुषेण |
४ क