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वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्यां नृपानेकरथेन जित्वा; वृकोदरः सानुचरान्रणेषु |
१७ क
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च पार्वतीय़ांस्तथा नृपान् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च भूमिपान्भूमिपर्षभ ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्यानुदीच्यान्मध्यांश्च दक्षिणात्यानकालय़त् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च कलिङ्गप्रमुखा नृपाः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रतीच्योदीच्यवासिनः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रवीरा गजय़ोधिनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च भीमसेनस्य भागतः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे; निपातिताः क्षुद्रकमालवाश्च |
१३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे; वसातय़ः क्षुद्रकमालवाश्च |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
प्राच्यैः प्रतीच्यैरथ दाक्षिणात्यै; रुदीच्यकाम्वोजशकैः खशैश्च |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
प्राच्योदीच्या दाक्षिणात्याश्च शूरा; स्तथा प्रतीच्याः पार्वतीय़ाश्च सर्वे |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
प्राच्योदीच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च मारिष ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राजापत्यं तथैवैन्द्रमाग्नेय़ं च सुदारुणम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
प्राजापत्यं त्रिदिवं व्रह्मलोकं; नाधर्मतः सञ्जय़ कामय़े तत् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
प्राजापत्यं हि नक्षत्रं ग्रहस्तीक्ष्णो महाद्युतिः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राजापत्यं ह्यङ्गिरसं पृष्टवानस्मि भारत |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
प्राजापत्यमदत्त्वाश्वमग्न्याधेय़स्य दक्षिणाम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
प्राजापत्या इति व्रह्मञ्जपेन्नित्यं यतव्रतः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विरोचन उवाच
प्राजापत्या हि वै श्रेष्ठा वय़ं केशिनि सत्तमाः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
प्राजापत्याः सन्ति लोका महान्तो; नाकस्य पृष्ठे पुष्कला वीतशोकाः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
प्राजापत्ये वसेत्पद्मं वर्षाणामग्निसंनिभे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
प्राजापत्येन विधिना विश्वासात्काममोहितौ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राजृम्भत महाकाय़ो हनूमान्नाम वानरः ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
प्राज्ञ एको रमते व्राह्मणानां; प्राज्ञ एको वहुभिर्जोषमास्ते |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
प्राज्ञ एको वलवान्दुर्वलोऽपि; प्राज्ञ एषां कलहं नान्ववैति ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
प्राज्ञं मूढं तथा शूरं भजते यादृशं कृतम् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राज्ञः प्राज्ञं प्रलापज्ञः सम्यग्धर्मार्थदर्शिवान् ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
प्राज्ञः शूरो धनस्थश्च स्वामी धार्मिक एव च |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
प्राज्ञः सर्वास्त्रविच्छूरो मुह्यते न च संय़ुगे ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो; विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
प्राज्ञश्च सत्यसन्धश्च सर्वभूतहिते रतः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
प्राज्ञस्तु जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
प्राज्ञस्य कर्माणि दुरन्वय़ानि; न वै प्राज्ञो मुह्यति मोहकाले |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
प्राज्ञस्य नृपतेराशु वृद्धिर्भवति पुत्रक |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रिय़ः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्राज्ञस्य मूढस्य च जीवितान्ते; प्राणप्रमोक्षोऽन्तकवक्त्रगस्य |
५४ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राज्ञस्य हीनवुद्धेश्च कर्मकोशः क्व तिष्ठति ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
प्राज्ञस्यानन्तरा वृत्तिरिह लोके परत्र च ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिह लोके परत्र च ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
प्राज्ञा मेधाविनो दक्षा युवानो मृष्टकुण्डलाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता दक्षाः शूरा वहुश्रुताः |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
प्राज्ञाः पुरुषकारं तु घटन्ते दाक्ष्यमास्थिताः ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
प्राज्ञाः सम्प्रतिषेधन्ते यथाशक्ति पुनः पुनः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्राज्ञाञ्शूरांस्तथैवाढ्यानेकस्थानेऽपि शङ्कते |
१४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
प्राज्ञाञ्शूरान्महेष्वासान्कर्मसु स्थिरपौरुषान् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राज्ञानां कृतविद्यानां स नरः शत्रुनन्दनः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
प्राज्ञानामात्मसम्वुद्धाः सम्वुद्धानाममानिनः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
प्राज्ञासिष्म वय़ं ताभ्यां शरैर्मुक्तैः सहस्रशः ||
४६ ख