कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ तदा कर्णः पाण्डवान्विजिगीषय़ा ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ तदा कर्णो यथा शक्रः प्रतापवान् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युद्ययौ प्रीतिय़ुतः स राजा; तं चाभ्यनन्दन्वृषभाः कुरूणाम् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युद्ययौ महातेजाः शक्रं वलिरिवासुरः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ महाराज गजः प्रतिगजानिव ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ महाराज तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युद्ययौ महाराज समस्तान्वानरध्वजः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ रणे यत्तो यत्तरूपतरं ततः ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ रणे रक्षो देवसेना यथा वलिम् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ रथेनैव मत्तो मत्तमिव द्विपम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ शिखण्डी तु महेष्वासो महाहवे ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययौ स सौभद्रस्तेजसा च वलेन च ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्यातश्च शैनेय़मेष भूरिश्रवा रणे ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्याता महाराज केकय़ान्भ्रातरः समम् ||
५२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
प्रत्युद्यातुमतस्तात नैतदामर्षय़ाम्यहम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्याते च गाङ्गेय़े त्वरितं विजय़ं प्रति ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्यातो रणे पार्थान्मद्रराजः प्रतापवान् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्युद्यास्यन्ति दाशार्हं रथैर्मृष्टैरलङ्कृताः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्याहि रणे पार्थ मद्रराजं महावलम् |
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्याहि रथेनैनं प्रवरं सर्वधन्विनाम् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
प्रत्युपस्थितकालस्य कार्यस्यानन्तरो भव ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
प्रत्युपस्थितकालस्य सुखस्य परिवर्जनम् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच ततः कृष्णः सान्त्वय़ानो युधिष्ठिरम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच ततः शौरिर्धार्तराष्ट्रमिदं वचः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच ततः सा तं व्राह्मणं चारुदर्शना |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनदुःखिता |
११७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच ततः सूतं रणमध्ये महावलः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच ततस्तान्वै पाण्डवान्सहकेशवान् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच ततो भीमः सम्प्रहृष्टतनूरुहः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच ततो यन्ता द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच ततो राजन्नभिमन्युमिदं वचः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
प्रत्युवाच ततो राजन्विनिश्चित्य तदार्तवत् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच ततो वाक्यं स्निग्धगम्भीरय़ा गिरा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
प्रत्युवाच ततोऽगस्त्यः प्रहसन्निल्वलं तदा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
भीष्म उवाच
प्रत्युवाच न शक्ष्यामि स्त्री सती निन्दितुं स्त्रिय़ः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच महातेजा धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच महातेजाः कालय़ुक्तमिदं वचः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
ईश्वर उवाच
प्रत्युवाच महात्मानं शिरसावनतः प्रभुम् ||
१३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच महावाहुं वासुदेवं यशस्विनम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच महावाहुर्मद्रराजमिदं वचः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
प्रत्युवाच महावाहो यथा वदसि कौरव ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
प्रत्युवाच महावुद्धिमुत्तङ्कं जनमेजय़ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच मय़ं पार्थो जीवय़न्निव भारत ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्युवाच यथा विप्रं तच्छृणुष्व नराधिप ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच वरारोहा भर्तुः प्रिय़हिते रता ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
नारद उवाच
प्रत्युवाच व्रजन्नेव प्रहसन्विनतात्मजः ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच स धर्मात्मा द्रौपदीं चारुदर्शनाम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच स धर्मात्मा धर्म्यमेवोत्तरं वचः ||
१२ ख