शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
प्रणिपातेन दानेन वाचा मधुरय़ा व्रुवन् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
प्रणीतं कर्मणा मार्गं नीय़मानः पुनः पुनः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
प्रणीतं सज्जनमनोवैक्लव्याश्रुप्रवर्तकम् ||
१९५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणीतभावमत्यन्तं युधि सत्यपराक्रमम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
प्रणीतमृषिभिर्ज्ञात्वा धर्मं शाश्वतमव्ययम् |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणीतां नो न गृह्णीत कार्यं किं चास्मदागमे ||
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणेता कीचकश्चास्य वलवानभवत्पुरा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
प्रणेतारं भुवनस्य प्रजापतिं; समाजग्मुस्तत्र देवास्तथान्ये ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
प्रणेतारश्च लोकानां शास्त्राणां च यशस्विनः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रणेदुः सर्वभूतानि वभूवुस्तिमिरा दिशः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
प्रणेदुरुन्मुखा राजन्मेघोदय़मिवेक्ष्य ह ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
प्रणेदुर्भक्ष्यमासाद्य विकृताश्च मृगद्विजाः ||
१३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रणेमुर्विधिवद्रामं सुग्रीवं लक्ष्मणं तथा ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
प्रणोत्स्यामि ज्वलितैर्वाणवर्षैः; शत्रूंस्तदा तप्स्यति मन्दवुद्धिः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
प्रणय़ं प्रतिसंहृत्य संस्तुतेष्वितरेषु च |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणय़ं प्रतिसङ्गृह्य निधाय़ात्मानमात्मनि |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणय़ं भावय़न्ती स्म सखीमध्य इदं वचः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
युधिष्ठिर उवाच
प्रणय़ं राजधर्माणां प्रव्रूहि भरतर्षभ ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रणय़ं व्यञ्जय़न्तीव मधुरं वाक्यमव्रवीत् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
प्रणय़स्व यथाश्रद्धं राजन्किं करवाणि ते ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
प्रणय़ादभिमानाच्च द्विषद्वृद्ध्या च दुर्मनाः |
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणय़ादुच्यमाना त्वं परित्यक्ष्यामि जीवितम् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
प्रणय़ाद्वहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणय़िन्या विशालाक्षि तत्क्षान्तं ते मय़ा शुभे ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
प्रणय़ेन व्रवीमि त्वां त्वं हि नः शरणागतः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रणय़ेय़ुर्यथान्याय़ं पुरुषास्ते युधिष्ठिर ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
प्रततं चास्यमानस्य धनुषोऽस्याशुकारिणः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
प्रततं व्यसृजद्राजंस्तत्सङ्कुलमवर्तत ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
प्रतपन्तं श्रिय़ा जुष्टं वर्तमानं च वन्धुषु |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
प्रतपन्तमनीकानि द्रोणः पुत्रमभाषत ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
प्रतपन्तमिवादित्यं निघ्नन्तं शात्रवान्रणे |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनय़ोः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनय़ोः ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतपन्पाण्डुपुत्रांस्त्वं रश्मिवानिव तेजसा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
प्रतरस्व नदीं वुद्ध्या कामग्राहसमाकुलाम् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रतरिष्ये महापारं भुजाभ्यां समरोदधिम् |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
प्रतरेमं महागाधं वाहुभ्यां पुरुषोदधिम् ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
प्रतर्दनं समाजघ्नुः शरवर्षैरुदाय़ुधाः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय़ नय़ने स्वके |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
प्रतर्दनः शिविर्मत्स्यः पृथ्वक्षोऽथ वृहद्रथः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
प्रतर्दनप्रभृतय़ो राम किं क्षत्रिय़ा न ते ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
प्रतर्दनस्य पुत्रस्तु वत्सो नाम महाय़शाः |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतर्दनादष्टकश्च रुशदश्वोऽष्टकादपि |
७९ क
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतर्दनेन शिविना समेत्य किल संसदि ||
५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
प्रतर्दनो दिवोदासः सौदासः कोसलेश्वरः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
प्रतर्दनो मैथिलश्च सङ्ग्रामं यत्र चक्रतुः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
प्रतर्दनो वसुमनाः शिविरौशीनरोऽष्टकः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थिरे ततो घोरं वनं तन्मनुजर्षभाः |
२६ ख