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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि; प्रय़ोजय़न्तो वलवृत्रसूदन ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
पुरैक एव नीय़से कुरुष्व साम्पराय़िकम् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
पुरैकेन हि भीष्मेण विजिताः सर्वपार्थिवाः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
पुरैवागमनादस्माद्वेदाहं त्वां धनञ्जय़ |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
पुरैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोक्तं तत्तथा भावि मा तेऽत्रास्तु विचारणा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोक्ता या भगवता तिर्यग्योनिगता शुभे |
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
पुरोगमाश्च ते सन्तु द्रविडाः सह कुन्तलैः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोचनभय़ाच्चैव व्यदधात्संवृतं मुखम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोचनस्य वचनात्कैलासमिव गुह्यकाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं विप्रमोचय़ ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोचने तथा हृष्टे कौन्तेय़ोऽथ युधिष्ठिरः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
पुरोडाशं भक्षय़तो दशनान्वै व्यशातय़त् ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
पुरोडाशं भक्षय़तो दशनान्वै व्यशातय़त् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
पुरोडाशो हि सर्वेषां पशूनां मेध्य उच्यते ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
पुरोद्यानानि सर्वाणि भेदय़ामास दुर्मतिः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
पुरोधसा सङ्गृहीतं हस्तेनालभ्य पार्थिवः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ वृहस्पतिम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोधा वृत्तसम्पन्नो नगरं नागसाह्वय़म् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
पुरोधाश्चाभवत्तस्य शुक्रो व्रह्ममय़ो निधिः ||
११६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
पुरोधाय़ मनो हीह कर्मण्यात्मा प्रवर्तते ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोपवाहिनीं तस्य नदीं शुक्तिमतीं गिरिः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
पुरोवातेन गङ्गेव क्षोभ्यमाना महानदी |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितं च कौरव्य वेदवेदाङ्गपारगम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
पुरोहितं धृतराष्ट्रस्य राज्ञ; आचार्याश्च ऋत्विजो ये च तस्य |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितं समानाय़्य इदं वचनमव्रवीत् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
पुरोहितः पाण्डवानां व्याघ्रचर्मण्यवस्थितम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितः सर्वसमृद्धतेजा; श्चकार धौम्यः पितृवत्कुरूणाम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितः सोमकानां मन्त्रविद्व्राह्मणः शुचिः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
पुरोहितकुले चैव सम्प्राप्ते व्राह्मणर्षभे ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
पुरोहितमते तिष्ठेद्य इच्छेत्पृथिवीं नृपः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
पुरोहितमथाहूय़ ऋत्विजं वसुधाधिपः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितममात्यांश्च सम्प्रहृष्टोऽव्रवीदिदम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
पुरोहितममित्रघ्नस्तदा संवरणो नृपः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
पुरोहितमिदं प्रष्टुमभिवाद्योपचक्रमे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽव्रवीदिदम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
पुरोहितवरं प्राप्य वसिष्ठमृषिसत्तमम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितसहाय़श्च जगामाश्रममुत्तमम् |
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १७४
अर्जुन उवाच
पुरोहितस्तमाचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
पुरोहिता महाभागा व्राह्मणा वै नराधिप ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पुरोहिताः शत्रुवधं वदन्तो; महर्षिवृद्धाः श्रुतवन्त एव |
७ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
पुरोहितापचाराच्च तस्य राज्ञो यदृच्छय़ा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहिताय़ धौम्याय़ प्रादादय़ुतशः स गाः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितेनाग्निसमानवर्चसा; सहैव धौम्येन यथाविधि प्रभो |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरोहितो भवान्नोऽस्तु राज्याय़ प्रय़तामहे |
३८ ख