वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
पिपासाशुष्कहृदय़ः प्रविवेशाश्रमं भृगोः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
पिपासितस्येव यथा भवेत्पय़; स्तथा त्वय़ा वाक्यमिदं समीरितम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
पिपासितेन याः पीता विधिमन्त्रपुरस्कृताः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
पिपासय़ा न म्रिय़ते सोपच्छन्दश्च दृश्यते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
पिपीलकस्तु षण्मासान्कीटः स्यान्मासमेव च |
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पिपीलिका इव क्षुण्णा दुर्वला वलिना रणे ||
७६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
पिपीलिकापुटं राजन्यथामृद्नान्नरो रुषा |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पिप्पलं च वटं चैव शणशाकं तथैव च |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
पिप्रीषुस्तव पुत्राणां सङ्ग्रामेष्वपराजितः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
पिप्रीषुस्ते सुतान्राजन्दिधक्षुश्चैव पाण्डवान् ||
८९ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
पिप्लुं दृष्ट्वा सुनन्दा च राजमाता च भारत |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
पिवन्त इव तद्व्योम जग्मुर्द्रौणिरथं प्रति ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
पिवन्ति चाश्नन्ति च यत्र दुर्दृशाः; पिशाचसङ्घा विविधाः सुभैरवाः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पिवन्ति तद्रसं हृष्टा जना नित्यं जनाधिप |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
पिवन्ति मुनय़ो यत्र हविर्धाने स्म सोमपाः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
पिवन्ती वारिमुख्यानि शीतानि विमलानि च ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
पिवन्तीर्ललमानाश्च दिव्याभरणभूषिताः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
पिवन्तो निवसन्त्यत्र फेनपा मुनिसत्तमाः ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
पिवन्तोऽसृग्वसास्त्वन्ये क्रुद्धा व्रह्मद्विषां सदा |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
पिवन्त्येवोदकं गावो मण्डूकेषु रुवत्स्वपि |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
पिवन्त्यो दक्षिणां यस्य गङ्गास्रोतः समापिवन् |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
इन्द्र उवाच
पिवन्त्वन्ये यथाकामं नाहं पातुमिहोत्सहे ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
पिवन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
पिवन्निव शरौघांस्तान्द्रोणचापवरातिगान् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
पिवामि सुहुतं हव्यं कव्यं च श्रद्धय़ान्वितम् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
पिवाम्यपः समाविद्धास्ताश्चैव विसृजाम्यहम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
पिवेद्यश्चापि गङ्गाम्भः समौ स्यातां न वा समौ ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
पिशाचकिंनराणां च पूज्या वै पितरः सदा ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
पिशाचा दरदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
पिशाचा यातुधानाश्च गुह्यका भुजगा अपि ||
१७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
पिशाचा राक्षसाः प्रेता वहुधा म्लेच्छजातय़ः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
पिशाचानां सय़क्षाणां तथैव च सुरद्विषाम् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
पिशाचान्पक्षिणो नागान्पशूंश्चापि सहस्रशः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
पिशाचाश्चामितवला यत्र सिद्धाः सहस्रशः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
पिशाची दारुणाकारा कथ्यते शीतपूतना |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
पिशिताशिषु चान्त्येषु मूढ राजा भविष्यसि ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
पिशितेप्सुः क्षुधार्तस्तानपश्यत यदृच्छय़ा ||
२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
पिशुनां ये न भाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
पिशुनोऽथाकृतप्रज्ञो मत्सरी पापनिश्चय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
पिष्टमांसेक्षुशाकानां विकाराः पय़सस्तथा |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय़; आनीय़ापः परिनिर्णिज्य पादौ |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
पीठय़ोश्चोपविष्टौ तौ कृतातिथ्याह्निकौ नृप ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
पीडनं स्तम्भनं चैव कोशभङ्गस्तथैव च |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
पीडनास्कन्दकालश्च भय़कालश्च पाण्डव ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
पीडाकरममित्राणां यत्स्यात्कर्तव्यमेव तत् ||
४८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पीडितं तव पौत्रेण प्राय़ात्तत्र जनेश्वरः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
पीडितं नृपतिं दृष्ट्वा तव पुत्रा महारथाः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पीडितं प्रेक्ष्य राजानं सोदर्या भरतर्षभ |
५ क