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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
प्रववर्ष महाकाय़ो द्रुमवर्षं नभस्तलात् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रववर्षुर्दिवारात्रमसिताः सततं तदा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रववावनिलो राजञ्शुचिशुक्रागमे यथा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रववावनिलो रूक्षश्चण्डः शर्करकर्षणः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
प्रववुश्च शिवा वाताः प्रशान्ता मृगपक्षिणः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
प्रववौ च महावातः पांसुवर्षं पपात च |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
प्रववौ च शिवो वाय़ुः प्रजाश्च जहृषुस्तदा ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
प्रववौ चानिलः शीतो दिशश्च विमलाभवन् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
सोम उवाच
प्रवसन्वाप्यधीय़ीत वह्वीर्दुर्वसतीर्वसन् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
प्रवातेनोद्धतं राजन्धावद्भिश्चाश्वसादिभिः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
प्रवात्येष महावाय़ुरभितस्तव वाहिनीम् |
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
प्रवादितासु भेरीषु झर्झरेष्वानकेषु च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
प्रवादितेन नृत्यन्ति हृष्यन्ति कलहेषु च ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवादितैश्च वादित्रैर्जनकौतूहलेन च |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
प्रवादिनः सुचण्डाश्च क्रोधिनः किंनरीस्वनाः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवादेन हि मत्स्यानां राजा नाम्नाय़मुच्यते |
९ क
वन पर्व
अध्याय २१९
स्कन्द उवाच
प्रवाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
कृष्ण उवाच
प्रवारणं तु वालानां पूर्वं कार्यमिति श्रुतिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
प्रवालाङ्कुरवर्णश्च श्वेतवर्णः क्वचिद्वभौ |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
प्रवासं यदि मे भर्ता याति कार्येण केनचित् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रविद्धघण्टाङ्कुशतोमरध्वजैः; सहेममालै रुधिरौघसम्प्लुतैः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
प्रविद्धमतिवेगेन विक्षिप्तं कर्णसाय़कैः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
प्रविद्धमुर्व्यां निपपात पत्रिभि; र्धनञ्जय़ेनोत्तमकुण्डलेऽपि च ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
प्रविद्धवर्माभरणा वराय़ुधा; विपन्नहस्त्यश्वरथानुगा नराः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रविद्धवर्माभरणाम्वराय़ुधं; धनञ्जय़ेनाभिहतं हतौजसम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
प्रविभज्य यथान्याय़ं कथं वा समवस्थिताः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
प्रविभज्य वलं सर्वमनीकेषु व्यवस्थिताः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविविक्षुः स धर्मज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश कुरुश्रेष्ठ पुरं वारणसाह्वय़म् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश गृहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमतः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश गृहं श्रीमान्यथा चैत्ररथं प्रभुः |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश ततः क्षिप्रं तानपास्य महावलः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
प्रविवेश ततस्तूर्णं क्षय़ं शत्रुक्षय़ङ्करः |
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
प्रविवेश ततो मध्यं रथसिंहः प्रतापवान् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
प्रविवेश तमो दीर्घं पीडितस्तैर्महारथैः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
प्रविवेश पितामह्याः कुन्त्या भवनमुत्तमम् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश पुनर्धीमान्नगरं वारणाह्वय़म् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभितम् |
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ वन्दिभिः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश पुरं हृष्टः स्ववेश्म च नराधिपः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश पुरीं दीनो दुःखशोकसमन्वितः ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिहर्षय़न् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
प्रविवेश महारण्यं मृगो राजाप्यथाद्रवत् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रविवेश महारण्यं शरभङ्गाश्रमं प्रति ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश महावाहुः शक्रस्य दय़ितां पुरीम् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रविवेश महावाहुर्मकरः सागरं यथा ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविवेश महावुद्धिः पूज्यमानो द्विजातिभिः ||
२ ख