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वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थिरे राष्ट्रमपेतहर्षा; युधिष्ठिरेणानुमता यथास्वम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थुर्विमले सूर्ये हिमवन्तं गिरिं प्रति ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थुश्च पुनर्वीराः पर्वतं गन्धमादनम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रतस्थे तत्र तत्रैव योधय़न्वै महारथान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थे नगरीं रम्यां द्रुपदस्य महात्मनः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थे नरशार्दूलः पक्षिराडिव वेगितः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतस्थे रुचिरं गृह्य समार्गणगुणं धनुः |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुपुङ्गवः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामव्रुवंस्तत्र तापसाः |
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतस्थे सह विप्रैस्तैर्भ्रातृभिश्च परन्तपः ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
प्रताने लम्वते सा तु जीविताशा शरीरिणाम् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
प्रतापतश्चोपनतं चतुर्विधं; तदस्ति सर्वं त्वय़ि पाण्डवेषु च ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
प्रतापस्तपसो ज्ञानं लोके संशव्दितं तपः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
प्रतापार्थं च राजेन्द्र वृत्तवद्भ्यः सदा नरः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रताप्य पाण्डवान्राजन्पाञ्चालांश्चास्त्रतेजसा ||
४३ ग
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
प्रताप्य पृथिवीं सर्वां रश्मिवानिव तेजसा |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
प्रताप्य लोकानिव कालसूर्यो; द्रोणो गतः स्वर्गमितो हि राजन् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रताप्य शरवर्षेण दिशः सर्वा महारथः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
प्रताप्य सेनामामित्रीं दीप्तैः शरगभस्तिभिः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
प्रताप्यमानं सूर्येण भीमेन च महात्मना |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
प्रतापय़ सुविस्रव्धं स्वगात्राण्यकुतोभय़ः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
प्रताम्यति ग्लाय़ति वा नापैति च तथातपात् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
प्रतार्यमाणस्तु स तैरल्पवुद्धिभिरण्डजः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
प्रति धर्मं विशेषेण कीर्तिमाप्नोति शाश्वतीम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रति भारतगोप्तारं समपद्यन्त भूमिपाः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
प्रति श्रवणपूर्वाणि नक्षत्राणि ससर्ज यः ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
प्रतिकं च शतं वृद्ध्या ददास्यृणमनुग्रहम् ||
६८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अकृतव्रण उवाच
प्रतिकर्तव्यमवले तत्त्वं वत्से व्रवीहि मे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
सूत उवाच
प्रतिकर्तव्यमित्येव येन मे हिंसितः पिता ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत ||
४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भृगुरु उवाच
प्रतिकर्तुं वलवति नहुषे दर्पमास्थिते ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
प्रतिकर्तुमशक्तस्य जीवितान्मरणं वरम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
प्रतिकर्तुमशक्याय़ वलस्थाय़ापकारिणे |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
प्रतिकर्म पुराचार ऋत्विजां स्म विधीय़ते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
प्रतिकुर्यां यथा तस्य तद्भवन्तो व्रुवन्तु मे ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु; स्तद्वर्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
यय़ातिरु उवाच
प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदनः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
प्रतिकृष्टेषु भावेषु व्यतिकृष्टेष्वसम्भवे |
४७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
प्रतिगृहाण मां देव यद्यशक्याः परे मय़ा ||
५७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णन्तु तत्सर्वं कौन्तेय़ा अविशङ्कय़ा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिगृह्णाति तत्पापं कर्तुः कर्मफलं हि तत् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णाति तत्पापं चतुर्थांशेन पार्थिवः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णातु सौहार्दात्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
प्रतिगृह्णामि ते कन्यामेकपुत्रफलाय़ वै |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिगृह्णामि ते वाचं सत्यामेतां जनार्दन |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
प्रतिगृह्णामि वो धेनुं कैवर्ता मुक्तकिल्विषाः |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णाम्यहं राजन्स्नुषां दुहितरं तव |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णीम तद्विद्धि एतन्नः शाश्वतं व्रतम् ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णीष्व कौन्तेय़ सरहस्यनिवर्तनान् ||
२७ ख