भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
प्राग्ज्योतिषाय़ चिक्षेप शरान्संनतपर्वणः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्राग्ज्योतिषेण संसक्तावुभौ दाशार्हपाण्डवौ |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
प्राग्ज्योतिषेण संसक्तौ भीमसेनघटोत्कचौ ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
धृतराष्ट्र उवाच
प्राग्ज्योतिषो वा पार्थस्य तन्मे शंस यथातथम् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
प्राग्ज्योतिषोऽथ तद्दत्त्वा भगदत्तोऽव्रजत्तदा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राग्द्वादश समा राजन्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
प्राग्रात्रापररात्रेषु धारय़ेन्मन आत्मना ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीय़ते |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राङ्निवेशात्तु राजानं व्राह्मणाः सपुरोधसः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
प्राङ्मुखं सीदमानं च रथादपच्युतं शरैः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
प्राङ्मुखः श्मश्रुकर्माणि कारय़ेत समाहितः |
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राङ्मुखः सविता देवः सर्वभूतहिते रतः ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
प्राङ्मुखः सह गान्धार्या कुन्त्या चोपाविशत्तदा ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राङ्मुखस्योर्ध्ववाहोः सा पर्यतिष्ठत पृष्ठतः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राङ्मुखाः पश्चिमे भागे न्यविशन्त ससैनिकाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राङ्मुखाः प्रय़युर्वीराः पाण्डवा जनमेजय़ ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
प्राङ्मुखो नित्यमश्नीय़ाद्वाग्यतोऽन्नमकुत्सय़न् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्राचलत्सर्वतो राजन्पूर्यमाण इवार्णवः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचिन्वान्खल्वश्मकीमुपय़ेमे |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
प्राची दिग्यज्ञवाहाश्च पावकाः सप्तविंशतिः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीं दिशं महात्मान आजग्मुस्ते महर्षय़ः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
प्राचीं दिशं श्रिता देवा जातवेदःपुरोगमाः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीं दिशमभिप्रेक्ष्य महर्षिरिदमव्रवीत् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीं राजा दक्षिणां भीमसेनो; जय़ः प्रतीचीं यमजावुदीचीम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीं राजा दक्षिणां भीमसेनो; यमौ प्रतीचीमथ वाप्युदीचीम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीनगर्भं तमृषिं प्रवदन्तीह केचन ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
प्राचीनवर्हिर्भगवांस्तस्मात्प्राचेतसो दश ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपुष्पितैः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राचेतसस्तथा दक्षः कन्याः षष्टिमजीजनत् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
प्राचेतसस्तथा दक्षो दक्षपुत्राश्च सप्त ये |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
प्राचेतसस्य वचनं कीर्तय़न्ति पुराविदः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
प्राचेतसेन मनुना श्लोकौ चेमावुदाहृतौ |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
प्राचोदय़त्समे देशे मातलिर्भरतर्षभ ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छाद्यत महाराज कर्णचापच्युतैः शरैः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़च्छितैर्वाणैर्महाराज शिखण्डिनम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़त्तमिषुभिर्महामेघ इवाचलम् ||
५९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्छादय़दमेय़ात्मा दिशः सूर्यस्य च प्रभाम् ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्छादय़दमेय़ात्मा नीहार इव पर्वतान् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़दरीन्सङ्ख्ये कालसृष्ट इवान्तकः |
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़दसम्भ्रान्तस्ततो द्रोण उवाच ह ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़द्दिशो राजन्धृष्टद्युम्नस्य संय़ुगे ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़न्महाराज दिशः सूर्यस्य च प्रभाम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़न्महेष्वासाः कुरवः कुरुनन्दनम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
प्राच्छादय़ेतामन्योन्यं तक्षमाणौ महेषुभिः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
प्राच्या दासा वृषला दाक्षिणात्याः; स्तेना वाह्लीकाः सङ्करा वै सुराष्ट्राः ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
प्राच्या मातङ्गय़ुद्धेषु कुशलाः शठय़ोधिनः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्या हता महाराज दाक्षिणात्याश्च सर्वशः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मय़ा तव ||
२२ ख