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वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातिष्ठत महावाहुः प्रगृह्य रुचिरं धनुः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातिष्ठत महावाहुर्दुर्योधनगृहान्प्रति ||
१०४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
प्रातिष्ठत शुकः सिद्धिं हित्वा लोकांश्चतुर्विधान् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातिष्ठत स दुष्टात्मा त्रीन्गृहीत्वा च पाण्डवान् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रातिष्ठत सुराहारी कीचकस्य निवेशनम् ||
१७ ग
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
प्रातिष्ठन्त मय़ि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं वसु ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
प्रातिष्ठन्त समुत्सृज्य त्वरय़न्तो हय़द्विपान् ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
प्रातीपः शन्तनुस्तात कुलस्यार्थे यथोत्थितः |
२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादक्षिण्यं चिकीर्षन्तः पृथिव्या योगधर्मिणः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
प्रादां दशगुणं व्रह्मन्न च तेनाहमागतः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
प्रादां नित्यं व्राह्मणेभ्यः सुरेश; नेहागतस्तेन फलेन चाहम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
प्रादां हेमस्रजां व्रह्मन्कोटीर्दश च सप्त च ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादाच्च तस्याः कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
प्रादाच्च द्रविणं प्रीत्या याजकानां नरेश्वरः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
प्रादाच्च व्रह्मणे भूय़स्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ||
५३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
प्रादाच्छक्रस्ततस्तस्मै पन्नगाय़ाय़ुरुत्तमम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
प्रादाच्छक्राय़ कर्णो वै तेन वैकर्तनः स्मृतः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
अर्जुन उवाच
प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि वृहन्ति च ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
प्रादात्काञ्चनमेकैकं निष्कं विप्राय़ पाण्डवः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
प्रादात्किरीटिने द्वारं पश्य निर्गुणतां मम ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
प्रादात्तस्मै स विप्राय़ वस्त्रं च सदृशं नवम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
प्रादात्ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादात्तेषां स भगवान्दिव्यं चक्षुर्जनार्दनः ||
१३ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
प्रादात्पूष्णश्च दशनान्पुनर्यज्ञं च पाण्डव ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
प्रादात्स तपसोपात्तं क्षुधिताय़ातिथिव्रती |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ३२
सूत उवाच
प्रादादनन्ताय़ तदा वैनतेय़ं पितामहः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
प्रादादिन्द्रमरीचिभ्यां मरीचिर्भृगवे ददौ ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
नकुल उवाच
प्रादाद्भ्रात्रे प्रिय़ः प्रेम्णा राजसूय़े महाक्रतौ ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादाद्युधिष्ठिरो धीमान्राज्यं चास्मै न्यवेदय़त् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
प्रादाद्विचित्रवीर्याय़ गाङ्गेय़ो हि यवीय़से ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८
सूत उवाच
प्रादाद्विषहणीं विद्यां काश्यपाय़ महात्मने ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादाद्वै धनुरत्नं तदक्षय़्यौ च महेषुधी ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रादाद्वैश्रवणाय़ैव प्रीत्या स रघुनन्दनः ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
प्रादान्ममैव भगवान्वरय़स्वेति चाव्रवीत् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
जरत्कारुरु उवाच
प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने |
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
प्रादीप्यन्त दिशः सर्वाः प्रदीपैस्तैः समन्ततः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासंस्ततो राजन्नानारूपाण्यनेकशः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासंस्ततो वाणा दीप्ताग्राः खे सहस्रशः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासन्ननभ्रे च वर्षं रुधिरकर्दमम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्निमित्तानि घोराणि च वहूनि च |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्निमित्तानि विजय़ाय़ वहूनि च |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासन्महाकाय़ास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासन्महारौद्राः सधूमाः पावकार्चिषः |
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
प्रादुरासन्महावीर्याः कर्णस्य रथमन्तिकात् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्महीपाल कार्ष्णाय़समय़ा गुडाः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्महोल्काश्च सनिर्घाता विशां पते ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्विनाशाय़ तदोत्पाताः सुदारुणाः |
२० ख
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुरासन्सकलुसाः फेनवत्यो विशां पते ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रादुरासन्सुघोराणि रूपाणि विविधान्युत ||
७ ख